• लूप क्वांटम ग्रैविटी क्या है?

    अनिरुद्ध सिंह.

    इंसान ने जब से सोचने की शुरुआत की तब से ही उसके मन में यह सवाल आता रहा कि प्रकृति कि विभिन्न भौतिक घटनाओं के बीच में क्या आंतरिक सम्बन्ध है? विज्ञान के इतिहास में ऐसे अनेक पड़ाव है जब मानव अलग -अलग प्राकृतिक घटनाओं के बीच में गहरे रिश्तों कि पड़ताल कर के प्रगति पथ पर अग्रसर हुआ. प्राचीन मानव ने जब मुख्तलिफ मौसमों के बीच में एक अनुक्रमिक सम्बन्ध पाया तब उसे वार्षिक कैलेंडर का ज्ञान हुआ. इसी के साथ जब मौसम का सूर्य और तारों के साथ तालमेल देखा गया तब खगोल विज्ञान और उसके कृत्रिम उपोत्पाद ज्योतिष का प्रकटीकरण हुआ.

    आधुनिक युग में भी भिन्न घटनाओं के बीच सम्बन्ध खोजने के प्रयास मनुष्य को भौतिक दुनिया को समझने में दूर तक सहायक साबित हुआ. न्यूटन ने फलों के धरती पर गिरने और चन्द्रमा का कक्ष में घूमने के बीच गहरा सम्बन्ध देखा और गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया. फैराडे और एम्पेयर जैसे वैज्ञानिको ने विधुत प्रवाह और चुम्बकीये क्षेत्र में सम्बन्ध देखा और मैक्सवेल द्वारा विधुत और चुम्बकीये क्षेत्र का गणितीय एकीकरण सम्पूर्ण हुआ. आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण और स्पेस टाइम के बीच के कनेक्शन की पड़ताल की.

    आधुनिक भौतिकी में आइंस्टीन का  रिलेटिविटी  सिद्धांत और हिजेनबर्ग – श्रोडिंगर- डिराक का क्वांटम सिद्धांत दो आधार भूत स्तम्भ है. रिलेटिविटी खगोलीय वस्तुओं पर लागू होती जो की मिलियन और बिलियन किलोमीटर के दूरी पर स्थित बहुत  ही भारी पिंडो की गतिविधियों का परिक्षण करती है. क्वांटम भौतिकी बहुत ही सूक्ष्म वस्तुओं का ऐटोमीय और नाभिकीय दूरी पर आपस में व्यवहार परखने की कोशिश करती है. लेकिन यह दोनों सिद्धांत एक दूसरे के साथ सुसंगत नहीं है और न ही एक दूसरे के पूरक है.

    नीचे दिए गए चित्र में आइंस्टीन की जनरल रिलेटिविटी थ्योरी और क़्वांटम फील्ड थ्योरी की उपयुक्तता के क्षेत्र वर्णित किये गए है. x -अक्ष पर दो परस्पर प्रभावी इकाईओं के बीच न्यूनतम दूरी अंकित है जिसे b  यानि की इम्पैक्ट पैरामीटर के नाम से जाना जाता है और y – अक्ष पर पिंडो की ऊर्जा अंकित है. जैसा की नीचे दिया गया चित्र बताता है कि एक ऐसा विस्तृत हरा क्षेत्र है जहां पर दोनों थ्योरी कोई निर्णायक समाधान नहीं दे पाती.

    जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी के अनुसार स्पेस-टाइम घुमावदार है और हर घटना निश्चयात्मक परिणाम लिए हुए होती है. क़्वांटम थ्योरी के अनुसार हर चीज़ निश्च्यात्मक न हो के सिर्फ संभावनाओं पर आधारित है और आतंरिक चरों में सार्वत्रिक समरूपता लिए हुए होती है. जनरल थ्योरी में आतंरिक चरों में सार्वत्रिक समरूपता का कोई स्थान नहीं है. जनरल थ्योरी में अवलोकन हमें सटीक नतीजे तक पहुँचाता है और इस थ्योरी में अवलोकित भौतिक मात्राओं के अलावा कोई आतंरिक चरों के संभावित प्रभाव कि गुंजाइश नहीं है. क़्वांटम ग्रैविटी कि सोच कि शुरुआत इसी चुनौती की एक बुद्धिवादी स्वीकृति  से हुई थी. लूप क्वांटम ग्रेविटी ने इन दोनों भौतिक सिद्धांतों का मिलान करने की दृष्टि से भौतिक जगत में प्रवेश किया. इसमें तार्किक रूप से सापेक्षतावाद और क्वांटम भौतिकी के मूल तत्त्व सम्मिलित है.  यह पृष्टभूमि में स्पेस टाइम के होने को सापेक्षतावाद की तरह नकारती है और साथ में स्पेस- टाइम के पृथक हिस्सों रूपी मौलिक क्वांटम इकाईओं  के होने की घोषणा भी करती है.

    कभी कभी दो सिद्धांतों का एक दुसरे से सुसंगत होना अपने आप में एक कठिनाई न हो कर एक असीम अवसर प्रदान करने का कारण बन सकता है. न्यूटन का उदाहरण हमारे सामने है.उन्होंने  गैलेलिओ के अनुवृत्त और केप्लर के दीर्घवृत्त को एकाकार कर के सार्वभौम गुरुत्वाकर्षण का पता लगाया. आइंस्टीन यांत्रिकी और विद्युत् गतिकी के बीच में असहमति का फायदा उठा कर विशेष सापेक्षतावाद तक पहुंचे. इसी प्रकार विशेष सापेक्षतावाद और न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण में विरोधाभास का संलयन कर के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत की स्थापना की. क्वांटम गुरुत्वाकर्षण भी इसी श्रेणी में एक चेष्टा है.

    क्वांटम ग्रेविटी के इतिहास में झाकेँ तब हमें काफी पीछे बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में जाना पड़ेगा. उस समय सोवियत रूस में भौतिकी विज्ञान के जादूगर लेव लैंडौ की एक भूल ने  क्वांटम ग्रेविटी की समझ पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. १९३१ में लैंडौ और पैअरल्स ने यह प्रस्तावित किया कि हैसेंबेर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत हमें इस तरफ भी ध्यान दिलाता है कि विद्युत् चुम्बकीय क्षेत्रों को भी मनमानी परिशुद्धतता के साथ मापा नहीं जा सकता. बोहर यह देख पाए कि लैंडौ के प्रस्ताव में गलती है. बोहर,रोसेनफेल्ड के साथ मिल कर १९३३ में यह साबित कर पाए कि विद्युत्-चुम्बकीय क्षेत्रों का  एकदम सटीक मान मापा जा सकता है. लैंडौ के करीबी दोस्त, मतवै पेत्रोविच ब्रॉन्स्टेइन ने इसी गणना को गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र पर दोहराया. उन्होंने यह पाया कि लैंडौ की सोच गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र पर सटीक बैठती है, अगर हम सामान्य सापेक्षता और क्वांटम भौतिकी दोनों को सत्य माने.

    ब्रॉन्स्टेइन का आखिरी फोटो चित्र.

    अगस्त 1937 में, मात्वेई ब्रोंस्टीन को स्टालिन के महान शुद्धिकरण अभियान के संदर्भ में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें एक संक्षिप्त मुकदमे में दोषी ठहराया गया और फाँसी दे दी गई. उनका दोष स्टालिनवाद के बिना साम्यवाद में विश्वास करना था.

    अब हम ब्रॉन्स्टेइन के मूल तर्क  को आसान भाषा में समझते है.  

    मान लीजिये कि आप किसी कण कि स्थिति L  बराबर दूरी कि सूक्ष्मता से मापना चाहते है. क्वांटम भौतिकी हमें यह बताती है कि किसी भी कण की स्थिति और संवेग में स्वाभाविक अनिश्चितता होती है जो की Δx और Δp के बराबर होती है और इन दोनों का गुणनफल, प्लांक स्थिरांक ħ से अधिक होना चाहिए. इस बात से हम ये निष्कर्ष निकाल सकते है कि, प्रथम, Δx  को L से कम होना चाहिए और द्वितीय ,  Δp को ħ/L से बड़ा होना चाहिए. क्योंकि ऊर्जा E,  अतितीव्र गतिमान कणों में , जोकि प्रकाश कि गति को छूते है, pc के बराबर होती है, जहां p  संवेग और c  प्रकाश की गति है , उसका भी ħc/L से बड़ा होना निश्चित है. अब हम गुरुत्वाकर्षण की ओर मुड़ते है. किसी श्याम विवर की श्वार्ज़चाइल्ड त्रिज्या  GM / c2  के बराबर होती है, जहाँ G यूनिवर्सल गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक है. अगर किसी कण की स्थिति इतनी संकुचित कर दी जाये की वह  L से कम हो जाये तब हैसेंबेर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत है यह बताता है कि उसकी ऊर्जा  ħc/L  से अधिक हो जाएगी और क्योंकि E = Mc2 के अनुसार ऊर्जा और द्रव्यभार एक ही माने जाते है, किसी श्याम विवर कि श्वार्ज़चाइल्ड त्रिज्या को उसकी ऊर्जा ,जो कि ħ/L  के बराबर है, के साथ सामान बनाने से हम यह  पाएंगे  कि:

    L=Gc3 L=\sqrt{\frac{\hbar}{Gc^3}} .

    यानी इस दूरी, जोकि 10-33 cm के बराबर है, से कम दूरी पर किसी कण को स्थानबद्ध करना अर्थहीन है, क्योंकि इस दूरी से कम दूरी से कोई जानकारी निकालना असंभव है जोकि एक श्याम विवर के घटना क्षितिज के अंदर है. ब्रोंस्टीन के शब्दों में: “शास्त्रीय अवधारणाओं में गहन संशोधन के बिना ऐसा प्रतीत होता है कि गुरुत्वाकर्षण के क्वांटम सिद्धांत को [अल्प-दूरी] क्षेत्र तक विस्तारित करना लगभग असंभव है.” [ब्रोंस्टीन (1936)]. इसका तात्पर्य यह है कि क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत द्वारा प्रदान की गई पारंपरिक सहज समझ क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के लिए विफल हो जाती है. क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत में क्वांटम क्षेत्रों को स्पेस टाइम पर परिभाषित करने की विश्वदृष्टि आम है, लेकिन क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के लिए इसे छोड़ना आवश्यक है. हमें भौतिकी करने का एक बिल्कुल नया तरीका चाहिए, जहाँ अंतरिक्ष और समय क्वांटम अवस्थाओं से पहले नहीं, बल्कि बाद में आते हैं. अंतरिक्ष और समय क्वांटम विन्यासों के साथ सिर्फ एक अर्धशास्त्रीय समीपता स्थापित करते हैं. क्वांटम अवस्थाएँ स्पेस टाइम पर क्वांटम अवस्थाएँ नहीं हैं. वे स्पेस टाइम की क्वांटम अवस्थाएँ हैं. यही वह है जो लूप क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रदान करता है.

    लूप क्वांटम ग्रेविटी  में, क्षेत्रफल और आयतन सतत नहीं होते, बल्कि प्लांक पैमाने पर असतत पैकेटों या क्वांटा के रूप में मौजूद होते हैं (क्षेत्रफल के लिए लगभग 10⁻⁷⁰ मीटर² और आयतन के लिए 10⁻¹⁵ मीटर³). ये क्वांटा इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि स्पेसटाइम स्वयं दानेदार होता है, जिसे स्पिन नेटवर्क द्वारा दर्शाया जाता है, जहाँ नोड्स आयतन क्वांटा होते हैं और लिंक क्षेत्रफल क्वांटा होते हैं, जो अंतरिक्ष को एक चिकने सतत क्षेत्र के बजाय परिमित लूपों के बुने हुए ताने-बाने के रूप में प्रकट करते हैं.

    क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के उद्भव से जुड़े चार प्रमुख विचारक. बाएं से: लैंडौ, बोहर, रोसेनफेल्ड और ब्रोंस्टीन. यह तस्वीर खार्कोव में ली गई थी और 20 मई, 1934 को अखबार खार्कोवस्की राबोची (द खार्कोव वर्कर) में प्रकाशित हुई थी.

    चित्र साभार: Covariant Loop Quantum Gravity: An elementary introduction to Quantum Gravity and Spinfoam Theory.  कार्लो रोवेली और फ्रांसेस्का विडोटो.

  • अनिरुद्ध सिंह.

    छपाई का आविष्कार संसार के उन महत्वपूर्ण आविष्कारों की श्रेणी में आता है जिसने दुनिया की तस्वीर ही बदल कर रख दी. इसकी मदद से पुस्तकें , अखबार , पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगी और दुनिया में व्यापक स्तर पर आम -जन में साक्षरता का प्रवाह हुआ.

    छपाई का इतिहास करीब ५००० साल पुराण है. सबसे पहले प्राचीन मेसोपोटामिया में ३००० वर्ष ईसा पूर्व इसका इस्तेमाल होने लगा जब गोल मोहर को मिट्टी की पट्टी पर दबा कर एक से ज़्यादा प्रतिबिम्ब उकेर कर कई प्रति लिपियाँ बनाई जाने लगी. यही तकनीक चीन , मिस्र , भारत  और यूरोप में भी काम में लायी जाने लगी. धीरे-धीरे तकनीक में विकास के साथ कपड़ों और कागज़ के ऊपर छपाई भी होने लगी.

    छपाई की व्यापक स्तर पर शुरुआत  ठप्पा छपाई के रूप में प्राचीन भारत और चीन में हुई. चीन में प्रथम उदाहरण करीब २०० साल ईस्वी में कपड़े के ऊपर सामने आया. इस तरह की तकनीक में लिखाई या कोई चित्र एक लकड़ी के खंड पर अंकित किया जाता है. कपड़े पर जो जगह खाली रखनी होती है वह एक चाक़ू या धारदार औज़ार से लकड़ी पर काटी जाती है. जो सतह उभर कर आती है  उसे काली स्याही के सहारे एक ठप्पे में परिवर्तित कर दिया जाता है जो कपड़े पर अपनी छाप छोड़ जाता है. चीन में यह तकनीक आगे जा कर कागज़ पर भी इस्तेमाल की जाने लगी. इस तरह से कई बौद्ध धार्मिक ग्रन्थ विश्व में प्रचलित होने लगे.

    भारत में बौद्ध धर्म के आगमन के साथ शास्त्रों की छपाई पर ज़ोर दिया जाने लगा. धार्मिक प्रार्थनाएं मिट्टी की पट्टिकाओं  पर गोद के संभाल कर रखी जाने लगी थी. बौद्ध गाथाएं जैसे की नागार्जुन की प्रतीयसमुत्पद गाथा छटवी शताब्दी के दौरान मिट्टी की पट्टिका पर बहुत बड़ी तादाद में छापी गयी.

    ब्लॉक मुद्रण सबसे पहले चीन में रेशम के ऊपर प्रयोग में लाया गया. इस मुद्रण तकनीक द्वारा रेशम पर फूल और पत्तियां मुद्रित की जाती थी. सातवीं शताब्दी ईस्वीं के आस पास ब्लॉक मुद्रण का प्रयोग कागज़ पर भी होने लगा था. नवी शताब्दी तक एक मुकम्मल पुस्तक के मुद्रित होने के प्रमाण मिलते है. दसवीं  शताब्दी तक  सूत्रों और तस्वीरों  की लगभग ४००,०००  प्रतियां मुद्रित हो चुकी थी. धीरे-धीरे छपाई की तकनीक पूर्वी एशिया में जैसे की कोरिआ और जापान में फैलने लगी थी. इसके अलावा  फारस और रूस  तक भी इस तकनीक का फैलाव होने लगा था. यूरोप में छपाई का प्रयोग बहुत बाद में हुआ , जब इस्लामी सभ्यता ने इसका बढ़ाव पश्चिमी दुनिया में किया.

    तांग वंश चीन के समय का संस्कृत और चीनी भाषा में धरानी छापा, ६५०-६७० ईस्वी

    तांग वंश चीन के काल का हीरक सूत्र का मुख्य खंड , ८६८ ईस्वी.

    इस्लामी सभ्यता में ब्लॉक मुद्रण का प्रयोग इस्लामी सभ्यता के स्वर्णिम युग में दसवीं शताब्दी के आसपास  होने लगा था. अरबी में इस प्रकार के मुद्रण  को टर्श के नाम से जाना जाता है. यहाँ पर लकड़ी के अलावा टीन और अन्य धातुओं के ब्लॉक का भी उपयोग होने लगा था. ये लोग इस तकनीक का उपयोग प्राथनाओं की छपाई के लिए करते थे. बाद में इसका प्रयोग कपड़े के अलावा कागज़ पर भी होने लगा जब इन लोगो ने अपने धार्मिक ग्रंथों के अंशों की छपाई भी आरम्भ की.

    ठप्पा छपाई यूरोप में १३०० ईस्वीं के आसपास प्रयोग में लायी गयी. यह विधि सर्वप्रथम कपड़ों पर छपाई के काम में लायी गयी. कागज़ के प्रचार-प्रसार के बाद धीरे-धीरे ताश के पत्तों पर छपाई होने लगी. १४०० ईस्वीं के आसपास  इस तरह की छपाई भरी तादाद में होने लगी थी. मध्य १५वी शताब्दी में एक समूचे खंड पर मुद्रित पुस्तक, जिसमे शब्द और चित्र दोनों ही मौजूद थे, प्रकट होने लगी. इस तरह की पुस्तकों ने अपने ज़माने में काफी प्रसिद्धि हासिल की और ये पुस्तके वियोज्य टाइप द्वारा मुद्रित पुस्तकों को टक्कर देती थी.

    १०वी शताब्दी में चीन में छपाई की एक और तकनीक का आरम्भ हुआ. इसे वियोज्य टाइप तकनीक के नाम से जाना जाता है. इस तकनीक में यह ख़ास बात थी की छपाई के लिए धातु के चलायमान टुकड़ों का उपयोग किया जाता था. वियोज्य टाइप से छपाई अपने आधुनिक रूप में उभर पायी और छपाई की प्रक्रिया और ज़्यादा आसान और फलोत्पादक हो पायी. १०४० में चीनी मिट्टी पर उभारे गए टाइप के टुकड़े उत्पन्न किये गए और उन्हें छपाई के कार्य में लगाया गया.

    १०४० ईस्वी में बाई-शेंग ने वियोज्य छपाई का चीन में आविष्कार किया. उन्होंने मिट्टी के छपाई टुकड़ों की मदद से इस को फलस्वरूप किया. १२९८ में वांग झेन  ने लकड़ी के छपाई टुकड़ों का उपयोग शुरू किया. उन्होंने टाइप को घूमने वाली तालिकाओं में बैठाने की तकनीक में भी महारत हासिल की. इस तकनीक के उपयोग से टाइप बैठाना और छपाई करना और भी आसान हो गया. १२वी सदी में चीन में कागज़ के नोटों की छपाई का सिलसिला भी चालू हो गया था. धीरे धीरे यह छपाई कला चीन के आसपास दूसरे देशों में भी फैलने लगी. कोरिया में १२३० में पीतल के द्वारा वियोज्य छपाई होने लगी थी.

    १४५० में जोहानेस गुटेनबर्ग ने प्रथम वियोज्य छपाई का छापाखाना यूरोप में आरम्भ किया. इन्होने इसमें कई तरह के सुधार किये -जैसे कि हस्त मोल्ड का उपयोग, तेल पर आधारित स्याही का उपयोग,  मुद्रकों के उपयोगी  छापने कि पेंचदार मशीन और नरम और सोखदार कागज़ का उपयोग. गुटेनबर्ग वह पहला व्यक्ति था जिसने अपनी छपाई के लिए मिश्र धातु का उपयोग किया. उनके फॉर्मूले का इस्तेमाल आज भी छपाई के लिए किया जाता है. १४३६ में गुटेनबर्ग ने यूरोप के प्रथम छापेखाने की स्थापना की.

    वियोज्य छपाई के कारण छपाई प्रक्रिया और ज्यादा तेज़ और कुशलतापूर्वक पूरी होने लगी. धातु के ब्लॉक के इस्तेमाल से छपाई की गुणवत्ता में भी फर्क आया और अलग-अलग फॉन्ट का भी उपयोग होने लगा. छपाई के ऊपर व्यय में भी भरी कमी आयी. यह इसलिए हुआ क्योंकि धातु के ठप्पे ज़्यादा टिकाऊ होते थे. १४५५ में गुटेनबर्ग बाइबिल का प्रकाशन हुआ जिसकी छपाई उत्तमता पहले की तुलना में कही ज़्यादा थी और उसकी कीमत पहले से कही कम थी.  यूरोपीय  पुनःजागरण के काल में इस नयी छपाई तकनीक ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यूरोप में इसके फैलाव में इसका एक अहम् योगदान रहा. इसके बाद रोटरी प्रिंटिंग प्रेस का भी आगमन हुआ. १८४३ में रिचर्ड मार्च ने इसका उपयोग सबसे पहले शुरू किया. इसके इस्तेमाल से कागज़ के निरंतर रोल पर छपाई मुमकिन हो सकी.

    छपाई का प्रभाव एक से अधिक जगहों पर पड़ा. इसने सामजिक स्तर पर, धार्मिक और राजनैतिक स्तर पर और शिक्षा के क्षेत्र में एक गहरा असर छोड़ा. यह कहना गलत नहीं होगा कि इसका असर व्यापार पर भी उतना ही पड़ा जितना अन्य स्थानों पर. बड़ी-बड़ी यूनिवर्सटियों और पुस्तकालयों का निर्माण भी संभव हो सका. लेटरप्रेस और ऑफसेट छपाई के आने के बाद पुस्तकों कि छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी और सिर्फ चार सदियों के बाद पुस्तकों का व्यापार १० लाख  से १० करोड़ प्रतियों में बदल गया.

    शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी  परिवर्तन होने लगा और कुछ ही समय में एक बड़ा शिक्षित वर्ग खड़ा हो गया. जनमानस में आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा मिला और लोगो के नज़रिये में एक बड़े स्तर पर बदलाव होने लगा. राजाओं और सुल्तानों को यह समझ में आने लगा कि अगर राज करना है तो मुद्रित सामग्री पर नियंत्रण बेहद ज़रूरी है. धर्म के फैलाव में और धर्म का आधुनिक युग में एक मुख्य शक्ति के रूप में उभरने में भी मुद्रण तकनीक का एक बहुत बड़ा हाथ है. आज के युग में अखबार और मुद्रित मिडिया का बोलबाला है और उसे समाज में चौथी शक्ति का दर्जा प्राप्त है. प्रिंट मीडिया एक ऐसा शक्तिशाली हथियार है जिसके द्वारा सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर दूरगामी बदलाव संभव है और उसका समाज पर अप्रत्यक्ष परन्तु गहरा प्रभाव है.

    चित्र साभार : विकिपीडिया

  • अनिरुद्ध सिंह

    पहिया एक ऐसा आविष्कार है जिसे आविष्कार मानने में आज के व्यक्ति को कुछ खटका होगा. परन्तु देखा जाये तो पहिया हर जगह मौजूद है- चाहे वह किसी गाडी के टायर के रूप में हो या किसी मशीन के अंदर. यह भी सोचा जायेगा की पहिया  एक बहुत प्राचीन आविष्कार है जिसका स्थान और आविष्कारों की फेहरिस्त  में बहुत पीछे है. परन्तु पहिये का आविष्कार मानवीय इतिहास के काफी बाद वाले हिस्से में हुआ है. यह आविष्कार करीब ३५०० ई.पु. मेसोपोटामिया में हुआ है- यह हमें पुरातत्व खुगाई से प्राप्त सबूतों से ज्ञात होता है. इस युग को कांस्य युग कहा जाता है और इस युग में मानव कृषक के रूप में कार्य करने लगा था.

    पहिया क्यों इसी समय ईजाद हुआ? इसके दो प्रमुख कारण है. पहला मानव को एक सामाजिक व्यक्ति के रूप में सामान लाने और ले जाने की ज़रुरत थी. ज़रुरत आविष्कार की जननी होती है. इसी के साथ एक कारण यह भी  था कि पहिये को आकार देने के लिए धातु की ज़रुरत होती है जो उसी समय सर्वप्रथम मानव के पास मौजूद हुई. पहिये  को धुरी में बैठाना और उस पर किसी भारी वज़न को चलाना एक जीनियस का काम बताता है. इस काम को करना एक इंजीनियरिंग चुनौती के बराबर है क्योंकि अगर  पहिया और उसकी धुरी सम्पूर्ण रूप से गोलाकार नहीं होंगे तो पहिया नहीं घूमेगा. इसलिए पहिये का पहला प्रयोग कुम्हार के चाक के रूप में हुआ. किस संस्कृति में पहिये द्वारा चालित वाहन का आगमन सबसे पहले हुआ, इस प्रश्न का अभी तक समाधान नहीं हुआ है. सबसे पहले पहिये का चित्रण एक सिरामिक के पात्र के ऊपर देखने को मिलता है जो की करीब ३५०० ई.पु. में पोलैंड में प्राप्त हुआ है.

    सिरामिक पात्र ( पोलैंड में प्राप्त)

    यह माना जाता कि पहिये का आविष्कार एक ही जगह पर हुआ और वह वहां से पुरे विश्व में फैला. सबसे पुराण पहिया और उसकी धुरी स्लोवनिआ में प्राप्त हुई है जो कि करीब ३३४०-३०३० ई. पु . के बीच में बनायीं गयी होगी.

    स्लोवानिआ के लुबियाना के दलदल में पाया गए पहिया और उसकी धुरी.

    पहिये का चाक के रूप में प्रयोग प्राचीन सुमेर में हुआ. इसका प्रमाण हमें पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार देते है. यह एक भरी चपटे गोलाकार चक्र के रूप में होता था जो कि मिटटी का बना होता था. इसके द्वारा कुम्हार हर प्रकार के मर्तबान और कटोरे बना सकता था. परन्तु यह आविष्कार एक स्वाभाविक तरीके से एक पहिये के रूप में परिवर्तित नहीं हुआ. वह विकास कई चरणों से गुज़रा, तब जा कर एक व्यावहारिक तरीका बना जिसमें किसी वज़न को ढो कर एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाया जा सके.

    एक क्रियाशील पहिये के विकास के कई चरण है जो कि निम्नलिखित है.

    १. जब मानव ने सर्वप्रथम महसूस किया कि भारी वस्तु को ले जाना आसान होगा जब एक गोलाकार वस्तु जैसे कि एक कटे हुए पेड़ का तना उसके नीचे स्थित किया जाये.

    २. इस चरण में पेड़ के तने और लकड़ियां एक साथ बाँध कर वस्तु के नीचे स्थित करके एक स्लेज के रूप में खींचा जाता था.

    ३. जैसे-जैसे पेड़ के तने लुढ़कते थे वह वस्तु के तल में नली के आकार के गड्ढे बना देता थे. मानव ने यह ग्रहण किया कि पहिये जो कि नली में फिट है वें ज़्यादा कार्यकुशल हैं.

    ४. इसके बाद एक ठेले का निर्माण हुआ जिसमें एक धुरी पर  घूमने वाले पहिये का उपयोग किया गए. धुरी अपने आप नहीं घूमती थी परन्तु वह ठेले के साथ जुडी होती थी. पहिये धुरी के ऊपर घूमते थे. इसके साथ पहिया एक सम्पूर्ण आविष्कार के रूप में प्रस्तुत हुआ.

     चीन में १२०० ई.पु. एक रथ के साथ जुड़े हुए पहिये के होने के पुख्ता प्रमाण है. ब्रिटैन में एक विशाल पहिए कि खोज हुई है जो कि लगभग एक मीटर की चौड़ाई का है. यह खोज बहुत ही हालिया है जो यह बताती है कि यह चक्का ११००-८०० ई. पु. का है और ब्रिटैन का सबसे पुराने किस्म का चक्का है जो कि एक घोड़ागाड़ी के खींचने के काम में लाया गया था.

    अमेरिकी सभ्यता में पहिये का प्रवेश शायद बच्चों के खिलौनों के रूप में पहली बार हुआ था जो कि करीब १५०० ई.पु. के आस पास देखा गया. कोलंबस के अमेरिका की खोज से पहले वहां के मूल निवासी किसी जानवर को पालतू बनाना जानते थे. इसलिए वहां पर पहिया यूरोपियों के आगमन के बाद प्रयोग में आने लगा.

    मिस्र में भी पहिया करीब ४०० साल ई.पु. चाक और पानी के चक्कों के रूप में इस्तेमाल होने लगा. बाक़ी के अफ़्रीकी महाद्वीप पर १९वीं  सदी तक पहिये का प्रयोग नहीं हुआ और यह तब बदला जब यूरोपियों का महाद्वीप पर आगमन हुआ. यूरोप में भी १९वीं सदी तक पहिया अपनी प्राचीन परिकल्पना से आगे विकसित नहीं हुआ, लेकिन औद्योगिक क्रांति के पश्चात पहिया प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख हिस्सा बन गया जो कि हज़ारों तरीकों से इस्तेमाल में लाया जाने लगा.

    जैसे-जैसे तकनीक का विकास होता है वैसे ही पुराने आविष्कार सचमुच पुराने पड़ जाते है और उनका उपयोग  धीरे-धीरे ख़त्म होता चला जाता है. लेकिन पहिया ऐसा आविष्कार है जिसने अपने मूल रूप को बरकरार रखते  हुए अपनी उपयोगिता आज के युग में भी सिद्ध की है. पहिये के बिना हम दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते. शायद इसीलिए पहिया या चक्र हमारी सोच में एक प्रतीकात्मक रूप लिए हुए है. एक चक्र को हम मौसम के बदलने की साईकिल या एक कभी न ख़त्म होने वाले जीवन चक्र के साथ जोड़ते है.

    चित्रों का श्रेय : विकिपीडिया और न्यू साइंटिस्ट.

  • डार्क मैटर का विज्ञान

    डाo अनिरुद्ध सिंह

    प्रस्तावना

    ब्रह्माण्ड के अनंत अंतरिक्ष में कुछ ऐसी खगोलीय वस्तुएँ मौजूद है जो हमारी इन्द्रियों द्वारा परिभाषित नहीं हो पाती  है. सामान्य पदार्थ हम अपनी इन्द्रियों द्वारा देख परख सकते है. खगोलीय वस्तुएँ हमे दूरबीन द्वारा दिखाई देती है. इन खगोलीय वस्तुओं से प्रकाश या फिर पराबैंगनी और अवरक्त किरणें निकलती हैं और हम विशेष प्रकार  की दूरबीन से इन्हे देख परख और समझ सकते हैं. यह खगोलीय वस्तुएं तीन प्रकार के मूल कणों द्वारा निर्मित होती है. ये कण प्रकृति की संरचना में भागीदार होते हैं. इन मूल कणों का नाम इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन है और यह तीन कण प्राकृतिक मूलावस्था के आधारभूत भवन खंड माने जाते हैं. परन्तु यह जान कर  आश्चर्य होगा की इन कणों की हिस्सेदारी ब्रह्माण्ड में केवल ५% ही है. सारी पृथ्वी इन्हीं तीन कणों द्वारा निर्मित है परन्तु ब्रह्माण्ड का सबसे अधिक भाग इन कणों द्वारा संरचित नहीं है.

    डार्क मैटर ब्रह्माण्ड के २७ प्रतिशत भार का वहन करता है. लेकिन वह प्रकाश का परावर्तन, अवशोषण अथवा विकिरण नहीं करता। इसलिए हम सीधे तौर पर इसका अवलोकन नहीं कर सकते. इसी प्रकार डार्क एनर्जी  करीब ६८ प्रतिशत के अनुपात में ब्रह्माण्ड का हिस्सा है. लेकिन उसको महसूस कर पाना वैज्ञानिकों  के लिए और भी कठिन है. फिर भी वैज्ञानिकों ने इन के होने का पूर्वकथन किन्ही कारणों से किया है. भौतिक विज्ञानं के  किन सिद्धांतो और प्रायोगिक अवलोकनों के आधार पर यह मुमकिन हो पाया है, इस लेख में हम इन तथ्यों को जानेंगे.

    डार्क मैटर के प्रमाण

    अगर हम इस खगोलीय पहेली के इतिहास में झांके तब हमें १८८४ के लार्ड केल्विन के उस लेख की चर्चा करनी होगी जिसमें उन्होंने प्रथम बार डार्क मैटर का उल्लेख किया था. उन्होंने यह पाया की अगर सूर्य के चारों तरफ ३२६० प्रकाश वर्ष की परिधि में मौजूद तारो की अलग अलग गतियों का विश्लेषण किया जाये तो वह इस तथ्य की तरफ इंगित करेगा की इस परिधि में लगभग एक अरब तारे होने चाहिए। ब्रह्मांडीय वस्तुओ की गतियों में फैलाव या विस्तार अगर ज्यादा है, तब यह इस तथ्य की तरफ इशारा करता है की उस क्षेत्र में पदार्थ का घनत्व भी अधिक होगा. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि ज्यादा घनत्व अधिक गुरुत्वाकर्षण का कारण बन जाने से उस क्षेत्र में तापमान या ऊर्जा  की बढ़ोतरी की वजह बन जाता है. इस कारण गतियां बढ़ जाने से उन में विस्तार के ज्यादा होने की संभावना भी बढ़ जाती है. ज्यादा घनत्व ब्रह्मांडीय पदार्थ में ज्यादा अस्थिरता भी पैदा करेगा जिस कारण उस मौजूद पदार्थ में गतियों के विस्तार का अधिकाय भी होगा.  लार्ड केल्विन के विश्लेषण के अनुसार सूरज के आस  पास मौजूद तारों की गतियों के विस्तार इस बात की और इशारा करेंगे की सूर्य के  ३२६0 प्रकाश वर्ष  के व्यास के अंदर सौ करोड़ तारे होने चाहिए. लेकिन इन में से अधिकांश तारे किसी भी टेलिस्कोप से देखे नहीं जा सकते. उन्होंने यह निष्कर्ष निकला की इन तारो में अधिकांशतः अँधेरी काया वहन करते हैं.

    १९३० के दशक के शुरुआती सालों में जे. एच. ऊर्ट ने यह पाया की हमारी आकाश गंगा के तारों की गति उसमें पहले से ज्यादा द्रव्यमान होने का संकेत देती है. अपने प्रयोगों के दौरान उसने यह पाया की तारों की गति इतनी है की वे  पूर्व प्रस्तावित द्रव्यमान वाली आकाश गंगा के क्षेत्र से बाहर जा सकते हैं. उसके अनुसार ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि हमारी आकाशगंगा का द्रव्यमान  उस समय की जानकारी के अनुसार गणना किये हुए द्रव्यमान से काफी अधिक है. उसने इस खोज को आश्चर्यजनक माना और उसके मन में शायद इस गणना के प्रति संदेह भी रहा. लगभग उसी समय जब ऊर्ट ने अपनी खोज की, स्विस खगोलशास्त्री एफ. ज़्विकी को भी द्रव्यमान की कमी के समान संकेत मिले, लेकिन बहुत बड़े पैमाने पर. ज़्विकी ने पृथ्वी से लगभग ९९ एम.पी.सी (३२२ मिलियन प्रकाश वर्ष) दूर कोमा क्लस्टर का अध्ययन किया. गैलेक्टिक स्पेक्ट्रा में देखे गए डॉपलर शिफ्ट का उपयोग करके, कोमा क्लस्टर में आकाशगंगाओं के वेग फैलाव की गणना करने पर उसने यह पाया नेब्युलाओं के गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा(-जिसका हिसाब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत द्वारा लगाया जा सकता है)  के बीच के सम्बन्ध यह बताते है कि हर व्यक्तिगत आकाशगंगा का द्रव्यमान उसी आकाशगंगा की चमक द्वारा गणित द्रव्यमान से १००० गुना ज़्यादा है. यानी पर्यवेक्षित आकाशगंगा का सिर्फ २% द्रव्यमान ही दृश्यमान है और उसका अधिकांश द्रव्यमान गायब है या गोचर नहीं है.

    लगभग ४० साल बाद वेरा रुबिन और सहयोगियों ने एक और महत्वपूर्ण खोज को अंजाम दिया. इन लोगों ने करीब ६० गैलेक्सियों के घूरण का व्यापक अध्ययन किया. इन्होने पर्यवेक्षण के लिए इन गैलेक्सियों में तारों के बीच मौजूद हाइड्रोजन और हीलियम के बादलों को चुना. इस गुट के सदस्यों का मानना था की ये गैस के बादल लगभग उसी तरह व्यवहार करेंगे जिस तरह सौरमंडल में घुमते हुए ग्रह. सौरमण्डलीय ग्रह सूर्य से दूरी के अनुसार अपनी गति बदलते है. जैसे जैसे ग्रह सूर्य से दूर होते जाते है उनकी गति धीमी पड़ने लगती है, क्योंकि सौरमंडल का लगभग सारा द्रव्यमान सूर्य में ही केंद्रित है. यह व्यवहार केपलर के नियमों के अनुसार होता है और इसे केपलरिय व्यवहार के नाम से जाना जाता है. परन्तु उन्होंने पाया की इन गैसीय बादलों की गति गैलेक्सी के मध्य से बाहरी परिधि तक पहले तो बढ़ती है और एक सीमा के बाद स्थिर हो जाती है. इसका लेखाचित्र प्रतिरूपण नीच दिए गए चित्र में दिखाया गया है.

    चित्र १. केपलरिय व्यवहार बनाम मापी गयी गति.

    इसलिए, यदि घूर्णन वेग, त्रिज्या में वृद्धि के साथ स्थिर रहता है, तो त्रिज्या की बढ़त के साथ  द्रव्यमान में वृद्धि होनी चाहिए. चूंकि चमकदार द्रव्यमान का घनत्व आकाशगंगा के केंद्रीय क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए एकदम घटता जाता है , इसलिए “लापता” द्रव्यमान गैर-चमकदार होना चाहिए. रुबिन ने संक्षेप में कहा, “निष्कर्ष अपरिहार्य है: द्रव्यमान, चमक के विपरीत, सर्पिल आकाशगंगाओं के केंद्र के पास केंद्रित नहीं है. इस प्रकार एक आकाशगंगा में प्रकाश वितरण द्रव्यमान वितरण के लिए बिल्कुल भी मार्गदर्शक नहीं है.”

    एक और आधुनिक तकनीक पर आधारित प्रमाण तब मिला जब गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग का प्रयोग डार्क मैटर की खोज के लिए किया गया. आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार वज़नदार खगोलीय वस्तुएं अपने चारों तरफ के अंतरिक्ष को मोड़ती है. जैसे प्रकाशीय लेंस प्रकाश किरणों को मोड़ने में सक्षम है उसी प्रकार एक वज़नदार खगोलीय वास्तु अपने पीछे स्थित पिंड से आते हुए प्रकाश की दिशा बदलने में समर्थ है. यह इसलिए होता है, क्योंकि सामान्य सापेक्षतावाद के सिद्धांत के कारण अंतरिक्ष और समय दोनों किसी वस्त्र की तरह सिकुड़ते,फैलते और मुड़ते है जब  उसपर कोई वज़न रख दिया जाता है. जब एक खगोलीय पिंड के सीध में एक और खगोलीय पिंड स्थित होता है, तब पीछे वाले पिंड की छवि पृथ्वी पर स्थित वेधशाला में एक प्रभा मंडल की तरह बनती है जिसके मध्य में आगे वाले पिंड की छवि बनी होती है. यह प्रभा मंडल गुरुत्वाकर्षण लेंस द्वारा प्रकाश को मोड़ कर बनाई गयी पीछे वाले पिंड की एक छवि है, जैसे एक साधारण लेंस किसी वस्तु की एक फैली हुई छवि बनाता है. बाहर वाले प्रभा मंडल की त्रिज्या बीच वाले पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर करती है. खगोलशास्त्रियों ने इन गुरुत्वाकर्षण लेंस द्वारा निर्मित छवियों का अध्ययन किया तो पाया कि लेंस बनाने वाले अग्रिम पिंड के द्रव्यमान की जब प्रभा मंडल की त्रिज्या से गणना की गयी तब वह उसी की चमक से गणना किये गए द्रव्यमान से कही अधिक थी. यह इस बात का द्योतक था कि केंद्रीय समूह में डार्क मैटर की अत्यधिकता है.

    डार्क मैटर के उम्मीदवार

    सिद्धांत कारों ने डार्क मैटर के ढेर सारे उम्मीदवार खोज लिए है. लेकिन यह खोजें, सिद्धांतों तक ही सीमित है. २० साल पहले तक डार्क मैटर की उम्मीदवारी हलकी चमक वाले तारो, या तारों के बीच में पाईं जाने वाली वस्तुएं , या फिर अंतरिक्ष के श्वेत बौने तारे और न्यूट्रॉन तारे और कृष्ण विवर करते थे. यह सब एक साथ एक सामान्य श्रेणी में मिल कर  “विशाल कॉम्पैक्ट हेलो वस्तुओं” (एम् .  ऐ. सी. एच. ओ.) के नाम से जाने जाते हैं. परन्तु सैद्धांतिक और प्रायोगिक कारणों से इस तरह के कम द्रव्यमान वाले खगोलीय पिंड ख़ारिज कर दिए गए. हबल स्पेस टेलिस्कोप का डाटा हमें यह बताता है कि इस तरह के तारे पूरे ब्रह्मांड का केवल ३% हिस्सा ही हो सकते है. इसी प्रकार भूरे बौने तारे या तारकीय अवशेषों को भी डार्क मटर का उम्मीदवार मानने कि कोशिश हुई परन्तु पुनः किन्ही कारणों से इन पर भी खगोलशास्त्रियों का विश्वास नहीं बन पाया. श्वेत बौने तारे अपने गठन से पहले बहुत ज़्यादा अवरक्त किरणों का उत्पादन करेंगे और उच्च ऊर्जा वाली गामा किरणों को सोखेंगे. ब्रह्मांड के द्रव्यमान वहन करने वाले अलग अलग कणों में से अगर हम सिर्फ श्वेत बौने तारो के गठन में प्रयुक्त होने वाले कणों कि ब्रह्मांड कि हिस्सेदारी की गणना करेंगे तो हम यह भी पाएंगे कि आकाशगंगा का कुल १५% हिस्सा ही श्वेत बौनों द्वारा निर्मित हो सकता है. इसके साथ ही श्वेत बौने अत्यधिक नाइट्रोजन और कार्बन का उत्पादन करेंगे जिसकी मौजूदगी हमें ब्रह्माण्ड  में नहीं दिखती.

    बेरयोनिक पदार्थ जो कि क्वार्क नामक मूल कणों द्वारा रचित है और जो कि साधारण द्रव्य जैसे तत्वों की रचना करते हैं, इनके अलावा डार्क मटर के अन्य उम्मीदवार भी प्रस्तावित किये गए है. इनमे कमज़ोर रूप से परस्पर क्रिया करने वाले द्रव्यमान वाले कण (डब्लू . आई. एम् . पी) और एक्सिऑन कण प्रमुख है. डब्ल्यू. आई. एम् . पी नामक कण क्योंकि कमज़ोर रूप से क्रियाशील है और इनका द्रव्यमान भी लघु नहीं है, इसलिए यह कण डार्क मैटर के एक सशक्त  उम्मीदवार माने  जाते हैं. अगर बिग बैंग ब्रह्माण्ड विज्ञानं के अंतर्गत कमज़ोर रूप से क्रियाशील कणों की ब्रह्माण्ड में प्रचुरता की गणना की जाती है तब वह डार्क मैटर की पूर्ति करते हुए दिखाई देते है. इतनी ही प्रचुरता हमें कमज़ोर रूप से क्रियाशील कणों की एलेक्ट्रो-वीक  थ्योरी द्वारा गणन किये हुए क्रॉस-सेक्शन द्वारा प्राप्त होती है. इसको डब्ल्यू. आई. एम् . पी चमत्कार के रूप में जाना जाता है. इसी प्रकार सुपरसिमेट्री नामक समरूपता हमें ऐसे कणों के बारे में बताती है जो कमज़ोर रूप से परस्पर क्रियाशील है और साधारण कणों के सुपर समरूपी जोड़ीदार है. अगर इनकी ब्रह्माण्ड में भागीदारी सुनिश्चित हो जाती है तब यह कण एक मज़बूत रूप से डार्क मैटर के प्रत्याशी होने चाहिए. सुपर सिमेट्री में साधारण कणों के जोड़ीदार कण अगर आर- समता का पालन करते है जिसके अनुसार एक प्रकार के कण (बेरियोंन या लेपटोन ) अपनी कुल संख्या संरक्षित रखते  है तब समय के साथ क्षय होने पर भी किसी श्रेणी के सबसे  हलके सुपर सिमिट्रिक कण अपनी संख्या बरकरार रखेंगे. इस प्रकार न्यूट्रैलिनो  जो की सबसे हलके सुपर सिमिट्रिक कण के प्रबल दावेदार है उनकी संख्या इतनी होगी की वह एक डब्ल्यू . आई. एम् . पी प्रकार के डार्क मैटर उम्मीदवार हो सकते है.

    एक्सिऑन कण की परिकल्पना न्यूट्रॉन कण के विद्युत द्विध्रुवीय आघूर्ण की उत्पत्ति पर आधारित है. कण भौतिकी के स्टैण्डर्ड मॉडल के अनुसार न्यूट्रॉन को विद्युत द्विध्रुवीय आघूर्ण प्रदान करने वाली गणितीय  घटक, प्रभार- समता समरूपता का उल्लंघन करने में सक्षम है. प्रभार-समता समरूपता का अर्थ है की किसी कण के विद्युत् प्रभार का उलट और उसका बिम्ब प्रतिरूपण एक साथ किया  जाये तब यह नयी स्थिति पहले वाली स्थिति के साथ परस्पर सममित रहती है. क्योंकि न्यूट्रॉन के विद्युत द्विध्रुवीय आघूर्ण के होने के कारण इस समरूपता का उल्लंघन होता है इसलिए किसी भौतिक तंत्र द्वारा एक प्रकार के कण उपजते है. यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसे की हिग्ग्स बोसॉन  की उत्पत्ति होती है जिन्हें ‘गॉड पार्टिकल’ के नाम से पिछले दशक में असीम प्रसिद्धि मिली है. हिग्ग्स बोसॉन की उत्पत्ति का तंत्र अन्य कणों पर भी अलग अलग तरह से लागू हो सकता है और एक्सिऑन कण भी इसी एक श्रेणी में आते हैं. इन कणों के द्रव्यमान की गणना यह बताती है की यह कण भी डार्क मैटर के एक सशक्त उम्मीदवार के रूप में नज़र आते है. विश्व में अनेक स्थानों पर और अलग-अलग तरीको से इन एक्सिऑन कणों के पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है.

    डार्क मैटर की खोज

    डार्क मैटर का पता लगाना (या बनाना) इसके गुणों और ब्रह्मांड में संरचना के निर्माण में डार्क मैटर की भूमिका निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है. कई प्रयोगों ने डब्लू. आई. एम्. पी जैसे डार्क मैटर (विशेष रूप से न्यूट्रलिनो के लिए) के संकेत की खोज की है और वर्तमान में खोज कर रहे हैं और प्रत्येक एक अलग पहचान विधि का उपयोग करता है.

    कण त्वरक में नए कणो की सृष्टि होती है जिस में से कई तरह के डब्लू . आई . एम्. पी श्रेणी के कण हो सकते है. यह कण द्रुत गति से सबसे हलके सुपर सीमेट्रिक कण में क्षय करने के बाद त्वरक से निकास करेंगे. यह इसलिए होगा क्योंकि यह कण कमज़ोर रूप से परस्पर क्रिया करते है और त्वरक की दीवारों से बिना किसी क्रिया किए निकल जाएंगे. यह कण अपने साथ ऊर्जा भी ले कर जाएंगे और इनका  अस्तित्व हम कुल ऊर्जा के घटने से पता लगा सकते है. इसी प्रकार क्योंकि इनकी परस्पर क्रिया एकदम शुन्य नहीं है, यह कण कभी परिवेशी पदार्थ के साथ क्रिया भी कर सकते है. किन्ही प्रयोगो में एक आध बार इनकी पारस्परिक क्रिया का पर्यवेक्षण भी किया जा सकता है. कुछ डार्क मैटर कण अपनी ऊर्जा  आस-पास के पदार्थ को प्रदान कर सकते है जिस कारण उन पदार्थो के नाभिक या इलेक्ट्रान उच्च ऊर्जा अवस्था में विस्थापित हो सकते हैं. यह अतरिक्त ऊर्जा या तो ध्वनि या तापमान में परिवर्तित हो जाएगी या पदार्थ को प्रभारित कर बैठेगी या फिर वे अतरिक्त ऊर्जा प्रकाश में तब्दील हो जाएगी. इन सब को प्रायोगिक रास्ते से अति शुद्धता के साथ मापा जा सकता है.

    अप्रत्यक्ष रूप में डार्क मैटर को ब्रह्माण्ड सम्बन्धी विधियों से जांचा परखा जा सकता है. कण भौतिकी में कणों की सृष्टि और विनाश दोनों ही मुमकिन है. ब्रह्माण्ड में डब्लू.आई .एम् .पी कणो के विनाश के चिन्ह देखने को मिल  सकते है. डार्क मैटर कण विनाश के दौरान अत्यधिक ऊर्जा वाली गामा किरणें, या न्युट्रीनो या फिर प्रति कणों का निर्माण कर सकता है जिसकी ब्रह्माण्ड में एक अनूठी छाप देखने को मिल सकती है.  वैज्ञानिक इन सब विधियों का इस्तेमाल कर के डार्क मैटर की खोज करने में जुटे हुए है.

    डार्क मैटर का भारतीय दर्शन के साथ सम्बन्ध.

    भारतीय दर्शन में “नेति नेति”  एक प्रकार का विश्लेषणात्मक ध्यान का स्वरुप है. यह ध्यान योग पद्धत्ति उपनिषदों और अवधूत गीता जैसे ग्रंथो में वर्णित है. इस ध्यान पद्धत्ति में ब्रह्माण्ड के स्वरुप के अर्थ को जानने के लिए जो कुछ भी ब्रह्माण्ड की वास्तविकता नहीं है, उसे नकारा जाता है. इसे ज्ञान योग का एक प्रमुख भाग माना जाता है.

    एस. एस. राघवाचार द्वारा लिखित पुस्तक “श्री रामानुजाचार्य के वेदार्थ संग्रह का परिचय” में एक और व्याख्या विशिष्टाद्वैत दृष्टिकोण पर आधारित है:

    “यह कि गणना किए गए रूप ब्रह्म के रूपों को समाप्त कर देते हैं, यही बात ‘नेति नेति’ में नकार दी गई है। ब्रह्म के रूपों को नकारने से कहीं दूर यह कथन ब्रह्म के रूपों की अनंतता पर जोर देता है। ‘नेति नेति’ अक्षर में नकारात्मक है, लेकिन आत्मा में पुष्टि की एक अति-प्रचुरता को दर्शाता है।”

    जैसा की ऊपर  दी गयी व्याख्या से स्पष्ट है की “नेति नेति”  ब्रह्म  के प्रत्यक्ष सबूतों से उपजे ज्ञान को सीमित मानता है और ब्रह्म की अनंतता को दर्शाता है. इसी के साथ “नेति नेति” ज्ञान योग चेतना में केवल प्रकट को सत्य मानने से नकारता है. ऐसा प्रतीत होता है की योग दर्शन द्वारा आत्मन और चेतना पर नियंत्रण कर के जो कुछ भी ब्रह्माण्ड में अप्रत्यक्ष है उसे अनुभव कर के स्वयं तक पहुंचा जा सकता है. यह कुछ  वैसा ही है जैसे प्रत्यक्ष पदार्थ को  नियंत्रित  कर के उस पर डार्क मैटर यानि की अप्रत्यक्ष का प्रभाव देखा जा सकता है,जैसा की भौतिकी के प्रयोगों में कोशिश की जाती है.

    अद्वैत के दार्शनिक आदि शंकराचार्य  ने यह भी कहा है कि “नेति नेति” का मुख्य कार्य है अज्ञान (अप्रत्यक्ष) से पैदा हुई बाधा को दूर करना. बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार ब्रह्म के दो रूप हैं, भौतिक और अभौतिक, ठोस और तरल, सत ‘अस्तित्व’ और त्या, ‘वह’ , सत्य – जिसका अर्थ है सच, ब्रह्म के अलावा हर चीज के अस्तित्व को नकारता है। और इसलिए, जीव जैसी कोई अलग इकाई मौजूद नहीं है जिसे शंकराचार्य ने अविद्या (अज्ञान) में ब्रह्म का प्रतिबिंब बताया है।

    उपरोक्त के अनुसार जीव यानि मैटर कि कोई अलग इकाई नहीं है और वह अप्रत्यक्ष यानि कि डार्क मैटर में प्रतिबिंबित है या समाया हुआ है. उपरोक्त टिप्पणियों से यह भी साबित होता है कि ध्यान योग साधना से हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष के बीच पारस्परिक क्रियाएं और अंतर भी समझ सकते है. “नेति नेति” एक अर्थ में अकथनीय होने के बावजूद वास्तविकता का सार है. वास्तविकता के हर रूप को नकारने के बावजूद वास्तविकता को नहीं नकारा जा सकता.

  • एंटीमैटर की कहानी.

    डॉ.अनिरुद्ध सिंह

    प्रस्तावना.

    जेनेवा की सर्न प्रयोगशाला में भौतिक शास्त्र के बेहद गहन प्रयोगो में से एक है प्रति द्रव्य का सृजन. प्रयोगशाला के एक दैत्याकार उपकरण, लार्ज हैड्रन कोलाइडर  के बंधे बंधाए संचालन के दौरान भारी मात्रा में एंटीमैटर का सृजन होता है. अत्यधिक ऊर्जा से निहित कणों को विरोधी दिशा में दौड़ाया जाता है और जब वें आपस में टकराते हैं तब अनेकानेक कणों की उत्पत्ति होती है, जिसमें से कई कण एंटीमैटर की श्रेणी में आते हैं. कहना ना होगा कि यह प्रक्रिया नए कण और प्रति-कण सृजित करती है ना कि उत्पादित. परंतु प्राकृतिक सृजन तो अब तक भगवान के हाथों में था. तब यह मूढ़ मनुष्य इस क्षेत्र में क्या कर रहा है? अगर आज मनुष्य भगवान की सृष्टि के रचक खंड, मूल कणों का सृजन इतने इत्मीनान से संभावित कर रहा है तब कभी वह पूरे ब्रह्मांड की सृष्टि भी इसी इत्मीनान से न करने लग जाए. चलिए जो वह अभी कर रहा है उसे जानने की कोशिश करते हैं. सबसे पहले तो यही जानते हैं कि यह एंटीमैटर यानी कि प्रति द्रव्य है क्या चीज़. क्यों इसको द्रव्य ना कहकर प्रति द्रव्य कहने की जरूरत है.

    प्राचीन पारम्परिक हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञानं में आकाश का एक विशेष स्थान है. यह पंचतत्वों में सब से प्रथम उल्लेख में आता है. संस्कृत में ‘कास’ एक अर्थ होता है ‘होना’ . भारतीय दर्शन  में आकाश को स्वतंत्र, सर्वव्यापी और शाश्वत पदार्थ माना जाता है जो ब्रह्मांड की संरचना के लिए आवश्यक है. हिन्दू दर्शन के अनुसार आकाश का सृजन पंचतत्वों में सबसे पहले हुआ था. बाकी सारे तत्त्व आकाश से ही उत्पन्न हुए है. पंचतत्वों में वायु (अर्थात अणु और परमाणु) आकाश से ही सीधे उत्पन्न हुई थी. बाकी तत्त्व भी एक के बाद एक उत्पन्न हुए जिन का मूल स्रोत्र आकाश ही है. आधुनिक भौतिकविद भी यह मानते है की पदार्थ के मूल कण और प्रति-कण शुन्य में से ही उपजते है. प्राचीन भारतीय दर्शन में आकाश  के सन्दर्भ में द्वैत की धारणा भी है. “आकाश में द्वैत” की अवधारणा को मूल वास्तविकता या आकाश के भीतर कथित पृथकता (द्वैत) और अंतर्निहित एकता (अद्वैत) के बीच परस्पर क्रिया के रूप में समझा जा सकता है. आधुनिक भौतिक विज्ञानं भी पदार्थ और प्रति पदार्थ के बीच में द्वैत और उनके बीच पारस्परिक सम्बन्ध में अद्वैत की उपस्थिति को देखता है.

    विस्तृत विवरण.

    ब्रह्मांड की हर वस्तु या पदार्थ परमाणुओं द्वारा रचित है. पानी की रचना हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक परमाणु के आपसी जुड़ाव के कारण होती है. यह परमाणु भी अपने आप में एक जटिल इकाई के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं. एक परमाणु तीन प्रकार के मूल कणों द्वारा संरचित होता है. ये है इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन. इनमें भारी कण प्रोटॉन और न्यूट्रॉन परमाणु के मध्य में उसके नाभिक में स्थित होते हैं और हल्का कण इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाता है. इस परमाणु के प्रारूप को एटम का सौरमंडलीय मॉडल कहा जाता है. इसी प्रकार अगर हम और अधिक ऊर्जा की सीमा के पार जाते हैं तब हमें अनेकानेक मूल् कणों से साक्षात्कार होता है. कणों की संख्या 1960 के दशक के अंत तक कई सौ के ऊपर हो चुकी थी और इसे ‘कणों का चिड़ियाघर’ के शीर्षक से जाना जाने लगा था. परंतु धीरे-धीरे प्रयोगों से यह जानकारी मिलने लगी यह कण संमिश्रित है और इससे भी ज्यादा छोटे मूल कणों के जुड़ाव से निर्मित हैं. नवीनतम जानकारी के अनुसार इस समय कण-भौतिकी के स्टैंडर्ड मॉडल के अंदर 17 मूल कणों की व्युत्पत्ति की गुंजाइश है. इन्हीं कणों के प्रति-कणं भी इसी ब्रह्मांड में मौजूद है. जब किसी कण का उसके प्रति-कण के साथ एकाकार होता है तब तक अत्यधिक विस्फोट के साथ दोनों का विनाश हो जाता है.

    इनका भार ऊर्जा में बदल जाता है. यह आइंस्टीन के प्रसिद्ध सूत्र E=mc2 के अनुसार होता है जो हमें यह बताता है कि किसी द्रव्य का भार ऊर्जा में किस प्रकार तब्दील होता है. आइंस्टीन के इस सूत्र से यह भी पता चलता है कि ऊर्जा विपरीत अवस्था में द्रव्य भार भी उत्पन्न कर सकती है. यही से कणों की सृष्टि ऊर्जामय सत्वो द्वारा संभव होती है.

    अगर इतिहास में हम इन प्रति-कणों की खोज के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करें तब हमें 1920 से 1930 के दशकों में पीछे जाना पड़ेगा. यह प्रति-कण जो की सामान्य कणों के समूह का विनाश करने में सक्षम है और जो कि अपना और अपने से जुड़े कण के अस्तित्व को व्योम में विलीन कर सकते हैं, इससे पहले किसी की जानकारी में नहीं थे. यह वह समय था जब मूल कणों की भौतिक पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी जिसे नवीन क्वांटम भौतिकी के रूप में जाना जाता है.

    क्वांटम भौतिकी के अनुसार मूल कण एक दोहरी अवस्था में अपना अस्तित्व रखते हैं. कुछ प्रयोग में यह पाया जाता है कि वह एक कण के रूप में विचारते हैं और कुछ अन्य प्रयोगों में वह एक तरंग के रूप में अपना आचरण करते पाए जाते हैं. इसे कण-तरंग द्वैतवाद के नाम से जाना जाता है. जब कणों की भौतिकी को लागू करके मूल कणों का अध्ययन किया गया तब यह पाया गया कि इन कणों के कुछ बुनियादी गुण होते हैं.  यह गुण ही एक प्रकार के मूल कणों का वर्गीकरण करते हैं और एक प्रकार के कणों को दूसरे प्रकार के कणों से भेद करते हैं. इन गुणों में मुख्य है कण का भार, उसका विद्युत आवेश, उसकी स्पिन, और उसका चुंबकीय आघूर्ण. आइंस्टीन के प्रसिद्ध सूत्र E=mc2 के अनुसार दो ऊर्जामय प्रकाश के कण आपस में टकराकर भारी कणों में तब्दील हो सकते हैं. परंतु यह प्रक्रिया कुछ भौतिकी के मूलभूत नियमों का पालन करते हुए ही होगी. इन नियमों में ऊर्जा संरक्षण का नियम, आवेश का संरक्षण, संवेग का संरक्षण, कोणीय संवेग का संरक्षण, स्पिन का संरक्षण वगैरा मुख्य है. क्योंकि ऊर्जा का द्रव्य में बदलने की प्रक्रिया में प्रक्रिया शुरू होने से पहले कुल आवेश का मूल्य शून्य है इसलिए प्रक्रिया के बाद भी कुल आवेश का मूल्य शून्य ही होना चाहिए- यह हमें आवेश के संरक्षण का सिद्धांत बताता है. इसलिए जो कण और प्रति कण इस प्रक्रिया में प्रकट होंगे उनका कुल आवेश शून्य ही होना चाहिए. यह शर्त अन्य गुणों के संरक्षण पर भी लागू होती है. जो दो कण ऊर्जा से द्रव्य में परिवर्तित होने वाली प्रक्रिया में प्रकट होंगे वह आपस में विपरीत आवेश, स्पिन और चुंबकीय आघूर्ण वाले होंगे. प्रक्रिया की समरूपता के कारण इन दो सृजित कणों का द्रव्य भार समान होगा. इन दो कण प्रति-कण युगल के प्रकट होने पर यह पाया जाता है कि उनके द्रव्यभार तो समान है परंतु आवेश और चुंबकीय आघूर्ण परस्पर विरोधी है.

    तब हम यह कह सकते हैं कि हर मूल कण का प्रति-कण भी इसी सृष्टि में मौजूद हो सकता है, जिसका द्रव्य भार एक दूसरे के समान है परंतु उसके अन्य मूलभूत गुण एक दूसरे से विपरीत होते हैं. अगर हम गणितीय प्रतिपादन की बात करें तब जब भौतिक शास्त्रियों को गणितीय सूत्रों में प्रति-कण के होने की निशानी दिखने लगती है तब यह पाया जाता है कि इसका कारण किसी प्रकार की गणितीय समरूपता ही है. गणितीय समरूपता का भौतिक शास्त्र में महत्व आइंस्टीन की ही सोच का नतीजा है. 1930 की दशक में ब्रितानवी भौतिकविद पॉल डिराक ने इसी गणितीय समरूपता को आधार बनाकर प्रति कणों की सृष्टि में मौजूद होने की भविष्यवाणी की थी. आइंस्टीन ने सापेक्षता-वाद के सिद्धांत के प्रतिपादन के दौरान यह पाया कि  सापेक्षतावाद दिक्-काल या अंतरिक्ष व समय के बीच में समरूपता का ही नतीजा है. इसी प्रकार डिराक के शोध के अनुसार कण प्रति-कण युगल भी एक गणितीय समरूपता का नतीजा है, जिसके अनुसार कण या प्रति-कण का अवलोकन किसी समरूपता के अनुसार परस्पर विनिमय के योग्य है. डिराक यह जानते थे कि अब तक के पूर्व सिद्धांतों के अनुसार प्रकाश की गति के करीब संचालित कणों की सूत्रीकरण ऋणात्मक ऊर्जा की तरफ इशारा करते हैं जबकि भौतिकी में ऋणात्मक ऊर्जा की संकल्पना उचित नहीं मानी जाती है.

    इसलिए डिराक ने ऐसी गणितीय सूत्रीकरण प्राप्त करने में अपने आप को व्यस्त किया जो इस प्रकार के दोष से मुक्त हो. कठिन उद्योग के उपरांत उन्होंने एक ऐसा समीकरण प्राप्त किया जो कि दिक्-काल के बीच एक परस्पर रैखिक संबंध स्थापित करता था. क्योंकि संबंध रैखिक था उसमें वर्गमूल की गणना की आवश्यकता नहीं थी. इसके कारण ऋणात्मक समाधान उपस्थित नहीं होते थे. इस कारण किसी भी भौतिक तंत्र में ऊर्जा का मूल्य ऋणात्मक नहीं होता. डिराक ने पाया कि यह समीकरण इलेक्ट्रॉन नाम के मूल कणों पर लागू होता है. साथ  ही यह भी पाया कि धनात्मक ऊर्जा वाले प्रति कण भी इसी समीकरण के समाधान द्वारा प्राप्त होते हैं. इन प्रतिकणों का नाम पॉज़िट्रान रखा गया जो इस बात का झोतक है यह कारण धनात्मक आवेश रखते हैं.

    डिराक के कण प्रतिकण युगल  के शुन्य में से निकलने का  विवरण डिराक द्वारा ही डिराक-समुद्र की परिकल्पना द्वारा समझा जा सकता है. क्यूंकि सापेक्षवादी ऊर्जा के सूत्र रैखिक न हो कर वर्ग समीकरण है, ऐसा किसी प्रकार के कणो के समीकरणों में हो सकता है की ऊर्जा के वर्गमूल लेने पर हमें ऋणात्मक समाधानों की प्राप्ति हो. डिराक इसे ऐसे समझते है की शुन्य एक ऊपर तक लबालब भरा हुआ इलेक्ट्रान का सागर है. इस सागर के तल की ऊर्जा शुन्य है. लेकिन तल के नीचे रहने वाले इलेक्ट्रान ऋणात्मक ऊर्जा वाले है. क्यूंकि यह समुद्र पूरा भरा हुआ है हमें पृथक इलेक्ट्रान कण नहीं दिखाई देते. परन्तु अगर शुन्य को ऊर्जा प्रदान कराई जाए तब कुछ इलेक्ट्रान तल के ऊपर आ सकते है और घनात्मक ऊर्जा प्राप्त कर सकते है. साथ ही डिराक समुद्र में इलेक्ट्रान की अनुपस्थिति के कारण एक छिद्र रह जाएगा  जो की हमारे सामने इलेक्ट्रान के प्रतिकण -पॉज़िट्रान के रूप में  दृश्यमान होगा. यहाँ हम आधुनिक भौतिकी और हिन्दू दर्शन के आकाश में द्वैत और अद्वैत की अवधारणा और साथ ही साथ आकाश से पदार्थ के निर्माण के बीच समानांतर  देख सकते है.  

    क्वांटम-क्षेत्र सिद्धांत में, कण और प्रतिकण एक समरूपता के माध्यम से संबंधित होते हैं जिसे सी.पी.टी. समरूपता के रूप में जाना जाता है, जहाँ सी का अर्थ है आवेश संयुग्मन (कण को ​​उसके प्रतिकण में बदलना), पी का अर्थ है समता (स्थानिक निर्देशांक को उलटना), और टी का अर्थ है समय उलटना (समय की दिशा को उलटना). सी.पी.टी. समरूपता के अनुसार, जब ये तीन परिवर्तन एक साथ लागू होते हैं, तो भौतिकी के नियम अपरिवर्तित रहने चाहिए. यह इसलिए होता है क्योंकि किसी अर्थ में प्रति-कण अपने जोड़े वाले कण का दर्पण प्रतिबिम्ब होता है.

    इस समरूपता का कणों और प्रतिकणों के व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जो यह सुझाव देता है कि प्रत्येक कण के लिए, विपरीत आवेश और क्वांटम संख्याओं वाला एक प्रति-कण मौजूद होता है. सी.पी.टी. समरूपता के तहत भौतिक नियमों की अपरिवर्तनीयता आधुनिक भौतिकी में एक मौलिक सिद्धांत है, जो इस विचार को पुष्ट करता है कि कण और प्रति-कण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. आधुनिक कण भौतिकी में नाभिकीय विज्ञानं में नाभिकीय बल के वाहक मेसोन्स कहलाये जाते है. नाभिकीय कण जैसे की प्रोटोन और न्यूट्रॉन अविभाज्य नहीं है और उनसे भी छोटे कण जिन्हे क्वार्क्स कहते है, उनसे बने हुए है. इन नाभिकीय कणो को जोड़ कर रखने वाले बल-वाहक कण मेसोन्स भी क्वार्क- प्रतिक्वार्क युगल के जुड़ाव से निर्मित होते है. यहाँ तक की प्रकृति के तीन मूलभूत बलों के एकीकरण में प्रति-कणो की प्रमुख भूमिका है. 

    1932 में कार्ल एंडरसन नाम के भौतिक विद ने कैलिफोर्निया में पहली बार पॉज़िट्रान की खोज की. यह पहला कण खोजा गया था जो एंटीमैटर की श्रेणी में आता है. एंडरसन ब्रह्मांडीय किरणों की छाप एक ऐसे उपकरण में देख रहे थे जिसमें एक कक्ष में अत्यधिक दबाव वाला वाष्प मौजूद होता है. जब इस बादल कक्ष में ब्रह्मांडीय किरणों का प्रवेश होता है तब यह किरणें एक घुमावदार रेखा के रूप में  वाष्प में अपना पद चिन्ह छोड़ता चली जाती है. इन रेखाओं के घुमावों को चुंबकों और विद्युत क्षेत्र द्वारा संचालित किया जा सकता है. एंडरसन ने इन घुमावदार पगडंडियों के अनेक फोटोग्राफ्स लिए. इनमें से एक चित्र में एक ऐसे कण के पद चिन्ह पाए गए जो की धनात्मक आवेश लिए हुए था और उसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान के बराबर था. 1 साल के कठिन पर्यवेक्षण के बाद यह पाया गया कि यह कण इलेक्ट्रॉन के साथ बादल कक्ष में एक ही बिंदु पर सृजित होते हैं. फिर इस बात को स्वीकारा गया यह नए कण प्रति-इलेक्ट्रॉन ही है और इस नई खोजे हुए कण का नाम  पॉज़िट्रान रखा गया.

    उपयोग.

    एंटीमैटर का उपयोग चिकित्सा में, संभावित ईंधन स्रोत के रूप में और हथियार के रूप में किया जाता है. पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (PET) तकनीक में पॉज़िट्रॉन का उपयोग शरीर की छवियाँ बनाने के लिए किया जाता है, जो कैंसर और अन्य स्थितियों का पता लगाने में मदद कर सकता है. ट्यूमर को लक्षित करने के लिए कैंसर के उपचार में एंटीप्रोटोन का उपयोग किया जाता है. एंटीमैटर का उपयोग अंतरग्रहीय और अंतरतारकीय यात्रा के लिए ईंधन स्रोत के रूप में किया जा सकता है. इसका उपयोग रॉकेट के लिए ईंधन स्रोत के रूप में किया जा सकता है. इसका एक और उपयोग ऐसे हथियार बनाने के लिए किया जा सकता है जो बड़ी मात्रा में ऊर्जा छोड़ते हैं. एंटीमैटर का अध्ययन कैंसर थेरेपी के संभावित उम्मीदवार के रूप में किया गया है. इसका उपयोग बाह्य अंतरिक्ष मिशनों के लिए ईंधन स्रोत के रूप में किया जा सकता है.

    उपसंहार.

    अगर आपने हॉलीवुड का एक प्रसिद्ध चलचित्र ‘एंजेल्स एंड डेमोंस’ देखा हो तब उसके प्रारंभिक भाग में जेनेवा की सर्न-प्रयोगशाला में एक हत्या के उपरांत एंटीमैटर को रखने के लिए बनाया गया एक विशेष डब्बा चोरी हो जाता है. उस डब्बे में पर्याप्त मात्रा में एंटीमैटर पहले से ही सुरक्षित रखा रहता है. उसके बाद रोम के वेटिकन को एक चेतावनी मिलती है कि रोम को एक भयानक धमाके से उड़ा दिया जाएगा- जो कि संभव हो सकेगा जब उसे थोड़े से एंटीमैटर का विलय साधारण द्रव्य के साथ किया जाएगा. आज एंटीमैटर का सृजन इन बड़ी प्रयोगशालाओं में आम बात है परंतु इसका बड़ी मात्रा में भंडारण एक समस्या है. वैसे तो एंटीमैटर के कुछ परंपरागत उपयोग जैसे की चिकित्सा विज्ञानं या फिर ऊर्जा और हथियारों की विकास संभव है. परन्तु ये सब भी तभी हो सकता है जब एंटीमैटर का बड़े पैमाने पर भण्डारण हो सके. क्या पता आने वाले समय में यह भी संभव हो सके और एंटीमैटर के नए उपयोग सामने आ पाए. जो भी हो एंटीमैटर का भौतिक विज्ञानं एक ऐसा विषय है जिस की जानकारी सृष्टि की हमारी अवधारणा को और भी धारदार बना देती है.

अनिरुद्ध सिंह का विज्ञान ब्लॉग

इस ब्लॉग में विज्ञान से जुड़े अनेक नए -पुराने अध्यायों का पुनर्निरीक्षण किया जायेगा.

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