पहिया: प्राचीन इंजीनियरिंग की भव्यता

अनिरुद्ध सिंह

पहिया एक ऐसा आविष्कार है जिसे आविष्कार मानने में आज के व्यक्ति को कुछ खटका होगा. परन्तु देखा जाये तो पहिया हर जगह मौजूद है- चाहे वह किसी गाडी के टायर के रूप में हो या किसी मशीन के अंदर. यह भी सोचा जायेगा की पहिया  एक बहुत प्राचीन आविष्कार है जिसका स्थान और आविष्कारों की फेहरिस्त  में बहुत पीछे है. परन्तु पहिये का आविष्कार मानवीय इतिहास के काफी बाद वाले हिस्से में हुआ है. यह आविष्कार करीब ३५०० ई.पु. मेसोपोटामिया में हुआ है- यह हमें पुरातत्व खुगाई से प्राप्त सबूतों से ज्ञात होता है. इस युग को कांस्य युग कहा जाता है और इस युग में मानव कृषक के रूप में कार्य करने लगा था.

पहिया क्यों इसी समय ईजाद हुआ? इसके दो प्रमुख कारण है. पहला मानव को एक सामाजिक व्यक्ति के रूप में सामान लाने और ले जाने की ज़रुरत थी. ज़रुरत आविष्कार की जननी होती है. इसी के साथ एक कारण यह भी  था कि पहिये को आकार देने के लिए धातु की ज़रुरत होती है जो उसी समय सर्वप्रथम मानव के पास मौजूद हुई. पहिये  को धुरी में बैठाना और उस पर किसी भारी वज़न को चलाना एक जीनियस का काम बताता है. इस काम को करना एक इंजीनियरिंग चुनौती के बराबर है क्योंकि अगर  पहिया और उसकी धुरी सम्पूर्ण रूप से गोलाकार नहीं होंगे तो पहिया नहीं घूमेगा. इसलिए पहिये का पहला प्रयोग कुम्हार के चाक के रूप में हुआ. किस संस्कृति में पहिये द्वारा चालित वाहन का आगमन सबसे पहले हुआ, इस प्रश्न का अभी तक समाधान नहीं हुआ है. सबसे पहले पहिये का चित्रण एक सिरामिक के पात्र के ऊपर देखने को मिलता है जो की करीब ३५०० ई.पु. में पोलैंड में प्राप्त हुआ है.

सिरामिक पात्र ( पोलैंड में प्राप्त)

यह माना जाता कि पहिये का आविष्कार एक ही जगह पर हुआ और वह वहां से पुरे विश्व में फैला. सबसे पुराण पहिया और उसकी धुरी स्लोवनिआ में प्राप्त हुई है जो कि करीब ३३४०-३०३० ई. पु . के बीच में बनायीं गयी होगी.

स्लोवानिआ के लुबियाना के दलदल में पाया गए पहिया और उसकी धुरी.

पहिये का चाक के रूप में प्रयोग प्राचीन सुमेर में हुआ. इसका प्रमाण हमें पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार देते है. यह एक भरी चपटे गोलाकार चक्र के रूप में होता था जो कि मिटटी का बना होता था. इसके द्वारा कुम्हार हर प्रकार के मर्तबान और कटोरे बना सकता था. परन्तु यह आविष्कार एक स्वाभाविक तरीके से एक पहिये के रूप में परिवर्तित नहीं हुआ. वह विकास कई चरणों से गुज़रा, तब जा कर एक व्यावहारिक तरीका बना जिसमें किसी वज़न को ढो कर एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाया जा सके.

एक क्रियाशील पहिये के विकास के कई चरण है जो कि निम्नलिखित है.

१. जब मानव ने सर्वप्रथम महसूस किया कि भारी वस्तु को ले जाना आसान होगा जब एक गोलाकार वस्तु जैसे कि एक कटे हुए पेड़ का तना उसके नीचे स्थित किया जाये.

२. इस चरण में पेड़ के तने और लकड़ियां एक साथ बाँध कर वस्तु के नीचे स्थित करके एक स्लेज के रूप में खींचा जाता था.

३. जैसे-जैसे पेड़ के तने लुढ़कते थे वह वस्तु के तल में नली के आकार के गड्ढे बना देता थे. मानव ने यह ग्रहण किया कि पहिये जो कि नली में फिट है वें ज़्यादा कार्यकुशल हैं.

४. इसके बाद एक ठेले का निर्माण हुआ जिसमें एक धुरी पर  घूमने वाले पहिये का उपयोग किया गए. धुरी अपने आप नहीं घूमती थी परन्तु वह ठेले के साथ जुडी होती थी. पहिये धुरी के ऊपर घूमते थे. इसके साथ पहिया एक सम्पूर्ण आविष्कार के रूप में प्रस्तुत हुआ.

 चीन में १२०० ई.पु. एक रथ के साथ जुड़े हुए पहिये के होने के पुख्ता प्रमाण है. ब्रिटैन में एक विशाल पहिए कि खोज हुई है जो कि लगभग एक मीटर की चौड़ाई का है. यह खोज बहुत ही हालिया है जो यह बताती है कि यह चक्का ११००-८०० ई. पु. का है और ब्रिटैन का सबसे पुराने किस्म का चक्का है जो कि एक घोड़ागाड़ी के खींचने के काम में लाया गया था.

अमेरिकी सभ्यता में पहिये का प्रवेश शायद बच्चों के खिलौनों के रूप में पहली बार हुआ था जो कि करीब १५०० ई.पु. के आस पास देखा गया. कोलंबस के अमेरिका की खोज से पहले वहां के मूल निवासी किसी जानवर को पालतू बनाना जानते थे. इसलिए वहां पर पहिया यूरोपियों के आगमन के बाद प्रयोग में आने लगा.

मिस्र में भी पहिया करीब ४०० साल ई.पु. चाक और पानी के चक्कों के रूप में इस्तेमाल होने लगा. बाक़ी के अफ़्रीकी महाद्वीप पर १९वीं  सदी तक पहिये का प्रयोग नहीं हुआ और यह तब बदला जब यूरोपियों का महाद्वीप पर आगमन हुआ. यूरोप में भी १९वीं सदी तक पहिया अपनी प्राचीन परिकल्पना से आगे विकसित नहीं हुआ, लेकिन औद्योगिक क्रांति के पश्चात पहिया प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख हिस्सा बन गया जो कि हज़ारों तरीकों से इस्तेमाल में लाया जाने लगा.

जैसे-जैसे तकनीक का विकास होता है वैसे ही पुराने आविष्कार सचमुच पुराने पड़ जाते है और उनका उपयोग  धीरे-धीरे ख़त्म होता चला जाता है. लेकिन पहिया ऐसा आविष्कार है जिसने अपने मूल रूप को बरकरार रखते  हुए अपनी उपयोगिता आज के युग में भी सिद्ध की है. पहिये के बिना हम दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते. शायद इसीलिए पहिया या चक्र हमारी सोच में एक प्रतीकात्मक रूप लिए हुए है. एक चक्र को हम मौसम के बदलने की साईकिल या एक कभी न ख़त्म होने वाले जीवन चक्र के साथ जोड़ते है.

चित्रों का श्रेय : विकिपीडिया और न्यू साइंटिस्ट.