एंटीमैटर की कहानी.
डॉ.अनिरुद्ध सिंह
प्रस्तावना.
जेनेवा की सर्न प्रयोगशाला में भौतिक शास्त्र के बेहद गहन प्रयोगो में से एक है प्रति द्रव्य का सृजन. प्रयोगशाला के एक दैत्याकार उपकरण, लार्ज हैड्रन कोलाइडर के बंधे बंधाए संचालन के दौरान भारी मात्रा में एंटीमैटर का सृजन होता है. अत्यधिक ऊर्जा से निहित कणों को विरोधी दिशा में दौड़ाया जाता है और जब वें आपस में टकराते हैं तब अनेकानेक कणों की उत्पत्ति होती है, जिसमें से कई कण एंटीमैटर की श्रेणी में आते हैं. कहना ना होगा कि यह प्रक्रिया नए कण और प्रति-कण सृजित करती है ना कि उत्पादित. परंतु प्राकृतिक सृजन तो अब तक भगवान के हाथों में था. तब यह मूढ़ मनुष्य इस क्षेत्र में क्या कर रहा है? अगर आज मनुष्य भगवान की सृष्टि के रचक खंड, मूल कणों का सृजन इतने इत्मीनान से संभावित कर रहा है तब कभी वह पूरे ब्रह्मांड की सृष्टि भी इसी इत्मीनान से न करने लग जाए. चलिए जो वह अभी कर रहा है उसे जानने की कोशिश करते हैं. सबसे पहले तो यही जानते हैं कि यह एंटीमैटर यानी कि प्रति द्रव्य है क्या चीज़. क्यों इसको द्रव्य ना कहकर प्रति द्रव्य कहने की जरूरत है.
प्राचीन पारम्परिक हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञानं में आकाश का एक विशेष स्थान है. यह पंचतत्वों में सब से प्रथम उल्लेख में आता है. संस्कृत में ‘कास’ एक अर्थ होता है ‘होना’ . भारतीय दर्शन में आकाश को स्वतंत्र, सर्वव्यापी और शाश्वत पदार्थ माना जाता है जो ब्रह्मांड की संरचना के लिए आवश्यक है. हिन्दू दर्शन के अनुसार आकाश का सृजन पंचतत्वों में सबसे पहले हुआ था. बाकी सारे तत्त्व आकाश से ही उत्पन्न हुए है. पंचतत्वों में वायु (अर्थात अणु और परमाणु) आकाश से ही सीधे उत्पन्न हुई थी. बाकी तत्त्व भी एक के बाद एक उत्पन्न हुए जिन का मूल स्रोत्र आकाश ही है. आधुनिक भौतिकविद भी यह मानते है की पदार्थ के मूल कण और प्रति-कण शुन्य में से ही उपजते है. प्राचीन भारतीय दर्शन में आकाश के सन्दर्भ में द्वैत की धारणा भी है. “आकाश में द्वैत” की अवधारणा को मूल वास्तविकता या आकाश के भीतर कथित पृथकता (द्वैत) और अंतर्निहित एकता (अद्वैत) के बीच परस्पर क्रिया के रूप में समझा जा सकता है. आधुनिक भौतिक विज्ञानं भी पदार्थ और प्रति पदार्थ के बीच में द्वैत और उनके बीच पारस्परिक सम्बन्ध में अद्वैत की उपस्थिति को देखता है.
विस्तृत विवरण.
ब्रह्मांड की हर वस्तु या पदार्थ परमाणुओं द्वारा रचित है. पानी की रचना हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक परमाणु के आपसी जुड़ाव के कारण होती है. यह परमाणु भी अपने आप में एक जटिल इकाई के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं. एक परमाणु तीन प्रकार के मूल कणों द्वारा संरचित होता है. ये है इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन. इनमें भारी कण प्रोटॉन और न्यूट्रॉन परमाणु के मध्य में उसके नाभिक में स्थित होते हैं और हल्का कण इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाता है. इस परमाणु के प्रारूप को एटम का सौरमंडलीय मॉडल कहा जाता है. इसी प्रकार अगर हम और अधिक ऊर्जा की सीमा के पार जाते हैं तब हमें अनेकानेक मूल् कणों से साक्षात्कार होता है. कणों की संख्या 1960 के दशक के अंत तक कई सौ के ऊपर हो चुकी थी और इसे ‘कणों का चिड़ियाघर’ के शीर्षक से जाना जाने लगा था. परंतु धीरे-धीरे प्रयोगों से यह जानकारी मिलने लगी यह कण संमिश्रित है और इससे भी ज्यादा छोटे मूल कणों के जुड़ाव से निर्मित हैं. नवीनतम जानकारी के अनुसार इस समय कण-भौतिकी के स्टैंडर्ड मॉडल के अंदर 17 मूल कणों की व्युत्पत्ति की गुंजाइश है. इन्हीं कणों के प्रति-कणं भी इसी ब्रह्मांड में मौजूद है. जब किसी कण का उसके प्रति-कण के साथ एकाकार होता है तब तक अत्यधिक विस्फोट के साथ दोनों का विनाश हो जाता है.
इनका भार ऊर्जा में बदल जाता है. यह आइंस्टीन के प्रसिद्ध सूत्र E=mc2 के अनुसार होता है जो हमें यह बताता है कि किसी द्रव्य का भार ऊर्जा में किस प्रकार तब्दील होता है. आइंस्टीन के इस सूत्र से यह भी पता चलता है कि ऊर्जा विपरीत अवस्था में द्रव्य भार भी उत्पन्न कर सकती है. यही से कणों की सृष्टि ऊर्जामय सत्वो द्वारा संभव होती है.
अगर इतिहास में हम इन प्रति-कणों की खोज के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करें तब हमें 1920 से 1930 के दशकों में पीछे जाना पड़ेगा. यह प्रति-कण जो की सामान्य कणों के समूह का विनाश करने में सक्षम है और जो कि अपना और अपने से जुड़े कण के अस्तित्व को व्योम में विलीन कर सकते हैं, इससे पहले किसी की जानकारी में नहीं थे. यह वह समय था जब मूल कणों की भौतिक पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी जिसे नवीन क्वांटम भौतिकी के रूप में जाना जाता है.
क्वांटम भौतिकी के अनुसार मूल कण एक दोहरी अवस्था में अपना अस्तित्व रखते हैं. कुछ प्रयोग में यह पाया जाता है कि वह एक कण के रूप में विचारते हैं और कुछ अन्य प्रयोगों में वह एक तरंग के रूप में अपना आचरण करते पाए जाते हैं. इसे कण-तरंग द्वैतवाद के नाम से जाना जाता है. जब कणों की भौतिकी को लागू करके मूल कणों का अध्ययन किया गया तब यह पाया गया कि इन कणों के कुछ बुनियादी गुण होते हैं. यह गुण ही एक प्रकार के मूल कणों का वर्गीकरण करते हैं और एक प्रकार के कणों को दूसरे प्रकार के कणों से भेद करते हैं. इन गुणों में मुख्य है कण का भार, उसका विद्युत आवेश, उसकी स्पिन, और उसका चुंबकीय आघूर्ण. आइंस्टीन के प्रसिद्ध सूत्र E=mc2 के अनुसार दो ऊर्जामय प्रकाश के कण आपस में टकराकर भारी कणों में तब्दील हो सकते हैं. परंतु यह प्रक्रिया कुछ भौतिकी के मूलभूत नियमों का पालन करते हुए ही होगी. इन नियमों में ऊर्जा संरक्षण का नियम, आवेश का संरक्षण, संवेग का संरक्षण, कोणीय संवेग का संरक्षण, स्पिन का संरक्षण वगैरा मुख्य है. क्योंकि ऊर्जा का द्रव्य में बदलने की प्रक्रिया में प्रक्रिया शुरू होने से पहले कुल आवेश का मूल्य शून्य है इसलिए प्रक्रिया के बाद भी कुल आवेश का मूल्य शून्य ही होना चाहिए- यह हमें आवेश के संरक्षण का सिद्धांत बताता है. इसलिए जो कण और प्रति कण इस प्रक्रिया में प्रकट होंगे उनका कुल आवेश शून्य ही होना चाहिए. यह शर्त अन्य गुणों के संरक्षण पर भी लागू होती है. जो दो कण ऊर्जा से द्रव्य में परिवर्तित होने वाली प्रक्रिया में प्रकट होंगे वह आपस में विपरीत आवेश, स्पिन और चुंबकीय आघूर्ण वाले होंगे. प्रक्रिया की समरूपता के कारण इन दो सृजित कणों का द्रव्य भार समान होगा. इन दो कण प्रति-कण युगल के प्रकट होने पर यह पाया जाता है कि उनके द्रव्यभार तो समान है परंतु आवेश और चुंबकीय आघूर्ण परस्पर विरोधी है.
तब हम यह कह सकते हैं कि हर मूल कण का प्रति-कण भी इसी सृष्टि में मौजूद हो सकता है, जिसका द्रव्य भार एक दूसरे के समान है परंतु उसके अन्य मूलभूत गुण एक दूसरे से विपरीत होते हैं. अगर हम गणितीय प्रतिपादन की बात करें तब जब भौतिक शास्त्रियों को गणितीय सूत्रों में प्रति-कण के होने की निशानी दिखने लगती है तब यह पाया जाता है कि इसका कारण किसी प्रकार की गणितीय समरूपता ही है. गणितीय समरूपता का भौतिक शास्त्र में महत्व आइंस्टीन की ही सोच का नतीजा है. 1930 की दशक में ब्रितानवी भौतिकविद पॉल डिराक ने इसी गणितीय समरूपता को आधार बनाकर प्रति कणों की सृष्टि में मौजूद होने की भविष्यवाणी की थी. आइंस्टीन ने सापेक्षता-वाद के सिद्धांत के प्रतिपादन के दौरान यह पाया कि सापेक्षतावाद दिक्-काल या अंतरिक्ष व समय के बीच में समरूपता का ही नतीजा है. इसी प्रकार डिराक के शोध के अनुसार कण प्रति-कण युगल भी एक गणितीय समरूपता का नतीजा है, जिसके अनुसार कण या प्रति-कण का अवलोकन किसी समरूपता के अनुसार परस्पर विनिमय के योग्य है. डिराक यह जानते थे कि अब तक के पूर्व सिद्धांतों के अनुसार प्रकाश की गति के करीब संचालित कणों की सूत्रीकरण ऋणात्मक ऊर्जा की तरफ इशारा करते हैं जबकि भौतिकी में ऋणात्मक ऊर्जा की संकल्पना उचित नहीं मानी जाती है.
इसलिए डिराक ने ऐसी गणितीय सूत्रीकरण प्राप्त करने में अपने आप को व्यस्त किया जो इस प्रकार के दोष से मुक्त हो. कठिन उद्योग के उपरांत उन्होंने एक ऐसा समीकरण प्राप्त किया जो कि दिक्-काल के बीच एक परस्पर रैखिक संबंध स्थापित करता था. क्योंकि संबंध रैखिक था उसमें वर्गमूल की गणना की आवश्यकता नहीं थी. इसके कारण ऋणात्मक समाधान उपस्थित नहीं होते थे. इस कारण किसी भी भौतिक तंत्र में ऊर्जा का मूल्य ऋणात्मक नहीं होता. डिराक ने पाया कि यह समीकरण इलेक्ट्रॉन नाम के मूल कणों पर लागू होता है. साथ ही यह भी पाया कि धनात्मक ऊर्जा वाले प्रति कण भी इसी समीकरण के समाधान द्वारा प्राप्त होते हैं. इन प्रतिकणों का नाम पॉज़िट्रान रखा गया जो इस बात का झोतक है यह कारण धनात्मक आवेश रखते हैं.
डिराक के कण प्रतिकण युगल के शुन्य में से निकलने का विवरण डिराक द्वारा ही डिराक-समुद्र की परिकल्पना द्वारा समझा जा सकता है. क्यूंकि सापेक्षवादी ऊर्जा के सूत्र रैखिक न हो कर वर्ग समीकरण है, ऐसा किसी प्रकार के कणो के समीकरणों में हो सकता है की ऊर्जा के वर्गमूल लेने पर हमें ऋणात्मक समाधानों की प्राप्ति हो. डिराक इसे ऐसे समझते है की शुन्य एक ऊपर तक लबालब भरा हुआ इलेक्ट्रान का सागर है. इस सागर के तल की ऊर्जा शुन्य है. लेकिन तल के नीचे रहने वाले इलेक्ट्रान ऋणात्मक ऊर्जा वाले है. क्यूंकि यह समुद्र पूरा भरा हुआ है हमें पृथक इलेक्ट्रान कण नहीं दिखाई देते. परन्तु अगर शुन्य को ऊर्जा प्रदान कराई जाए तब कुछ इलेक्ट्रान तल के ऊपर आ सकते है और घनात्मक ऊर्जा प्राप्त कर सकते है. साथ ही डिराक समुद्र में इलेक्ट्रान की अनुपस्थिति के कारण एक छिद्र रह जाएगा जो की हमारे सामने इलेक्ट्रान के प्रतिकण -पॉज़िट्रान के रूप में दृश्यमान होगा. यहाँ हम आधुनिक भौतिकी और हिन्दू दर्शन के आकाश में द्वैत और अद्वैत की अवधारणा और साथ ही साथ आकाश से पदार्थ के निर्माण के बीच समानांतर देख सकते है.
क्वांटम-क्षेत्र सिद्धांत में, कण और प्रतिकण एक समरूपता के माध्यम से संबंधित होते हैं जिसे सी.पी.टी. समरूपता के रूप में जाना जाता है, जहाँ सी का अर्थ है आवेश संयुग्मन (कण को उसके प्रतिकण में बदलना), पी का अर्थ है समता (स्थानिक निर्देशांक को उलटना), और टी का अर्थ है समय उलटना (समय की दिशा को उलटना). सी.पी.टी. समरूपता के अनुसार, जब ये तीन परिवर्तन एक साथ लागू होते हैं, तो भौतिकी के नियम अपरिवर्तित रहने चाहिए. यह इसलिए होता है क्योंकि किसी अर्थ में प्रति-कण अपने जोड़े वाले कण का दर्पण प्रतिबिम्ब होता है.
इस समरूपता का कणों और प्रतिकणों के व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जो यह सुझाव देता है कि प्रत्येक कण के लिए, विपरीत आवेश और क्वांटम संख्याओं वाला एक प्रति-कण मौजूद होता है. सी.पी.टी. समरूपता के तहत भौतिक नियमों की अपरिवर्तनीयता आधुनिक भौतिकी में एक मौलिक सिद्धांत है, जो इस विचार को पुष्ट करता है कि कण और प्रति-कण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. आधुनिक कण भौतिकी में नाभिकीय विज्ञानं में नाभिकीय बल के वाहक मेसोन्स कहलाये जाते है. नाभिकीय कण जैसे की प्रोटोन और न्यूट्रॉन अविभाज्य नहीं है और उनसे भी छोटे कण जिन्हे क्वार्क्स कहते है, उनसे बने हुए है. इन नाभिकीय कणो को जोड़ कर रखने वाले बल-वाहक कण मेसोन्स भी क्वार्क- प्रतिक्वार्क युगल के जुड़ाव से निर्मित होते है. यहाँ तक की प्रकृति के तीन मूलभूत बलों के एकीकरण में प्रति-कणो की प्रमुख भूमिका है.
1932 में कार्ल एंडरसन नाम के भौतिक विद ने कैलिफोर्निया में पहली बार पॉज़िट्रान की खोज की. यह पहला कण खोजा गया था जो एंटीमैटर की श्रेणी में आता है. एंडरसन ब्रह्मांडीय किरणों की छाप एक ऐसे उपकरण में देख रहे थे जिसमें एक कक्ष में अत्यधिक दबाव वाला वाष्प मौजूद होता है. जब इस बादल कक्ष में ब्रह्मांडीय किरणों का प्रवेश होता है तब यह किरणें एक घुमावदार रेखा के रूप में वाष्प में अपना पद चिन्ह छोड़ता चली जाती है. इन रेखाओं के घुमावों को चुंबकों और विद्युत क्षेत्र द्वारा संचालित किया जा सकता है. एंडरसन ने इन घुमावदार पगडंडियों के अनेक फोटोग्राफ्स लिए. इनमें से एक चित्र में एक ऐसे कण के पद चिन्ह पाए गए जो की धनात्मक आवेश लिए हुए था और उसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान के बराबर था. 1 साल के कठिन पर्यवेक्षण के बाद यह पाया गया कि यह कण इलेक्ट्रॉन के साथ बादल कक्ष में एक ही बिंदु पर सृजित होते हैं. फिर इस बात को स्वीकारा गया यह नए कण प्रति-इलेक्ट्रॉन ही है और इस नई खोजे हुए कण का नाम पॉज़िट्रान रखा गया.
उपयोग.
एंटीमैटर का उपयोग चिकित्सा में, संभावित ईंधन स्रोत के रूप में और हथियार के रूप में किया जाता है. पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (PET) तकनीक में पॉज़िट्रॉन का उपयोग शरीर की छवियाँ बनाने के लिए किया जाता है, जो कैंसर और अन्य स्थितियों का पता लगाने में मदद कर सकता है. ट्यूमर को लक्षित करने के लिए कैंसर के उपचार में एंटीप्रोटोन का उपयोग किया जाता है. एंटीमैटर का उपयोग अंतरग्रहीय और अंतरतारकीय यात्रा के लिए ईंधन स्रोत के रूप में किया जा सकता है. इसका उपयोग रॉकेट के लिए ईंधन स्रोत के रूप में किया जा सकता है. इसका एक और उपयोग ऐसे हथियार बनाने के लिए किया जा सकता है जो बड़ी मात्रा में ऊर्जा छोड़ते हैं. एंटीमैटर का अध्ययन कैंसर थेरेपी के संभावित उम्मीदवार के रूप में किया गया है. इसका उपयोग बाह्य अंतरिक्ष मिशनों के लिए ईंधन स्रोत के रूप में किया जा सकता है.
उपसंहार.
अगर आपने हॉलीवुड का एक प्रसिद्ध चलचित्र ‘एंजेल्स एंड डेमोंस’ देखा हो तब उसके प्रारंभिक भाग में जेनेवा की सर्न-प्रयोगशाला में एक हत्या के उपरांत एंटीमैटर को रखने के लिए बनाया गया एक विशेष डब्बा चोरी हो जाता है. उस डब्बे में पर्याप्त मात्रा में एंटीमैटर पहले से ही सुरक्षित रखा रहता है. उसके बाद रोम के वेटिकन को एक चेतावनी मिलती है कि रोम को एक भयानक धमाके से उड़ा दिया जाएगा- जो कि संभव हो सकेगा जब उसे थोड़े से एंटीमैटर का विलय साधारण द्रव्य के साथ किया जाएगा. आज एंटीमैटर का सृजन इन बड़ी प्रयोगशालाओं में आम बात है परंतु इसका बड़ी मात्रा में भंडारण एक समस्या है. वैसे तो एंटीमैटर के कुछ परंपरागत उपयोग जैसे की चिकित्सा विज्ञानं या फिर ऊर्जा और हथियारों की विकास संभव है. परन्तु ये सब भी तभी हो सकता है जब एंटीमैटर का बड़े पैमाने पर भण्डारण हो सके. क्या पता आने वाले समय में यह भी संभव हो सके और एंटीमैटर के नए उपयोग सामने आ पाए. जो भी हो एंटीमैटर का भौतिक विज्ञानं एक ऐसा विषय है जिस की जानकारी सृष्टि की हमारी अवधारणा को और भी धारदार बना देती है.
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