डार्क मैटर का विज्ञान
डाo अनिरुद्ध सिंह
प्रस्तावना
ब्रह्माण्ड के अनंत अंतरिक्ष में कुछ ऐसी खगोलीय वस्तुएँ मौजूद है जो हमारी इन्द्रियों द्वारा परिभाषित नहीं हो पाती है. सामान्य पदार्थ हम अपनी इन्द्रियों द्वारा देख परख सकते है. खगोलीय वस्तुएँ हमे दूरबीन द्वारा दिखाई देती है. इन खगोलीय वस्तुओं से प्रकाश या फिर पराबैंगनी और अवरक्त किरणें निकलती हैं और हम विशेष प्रकार की दूरबीन से इन्हे देख परख और समझ सकते हैं. यह खगोलीय वस्तुएं तीन प्रकार के मूल कणों द्वारा निर्मित होती है. ये कण प्रकृति की संरचना में भागीदार होते हैं. इन मूल कणों का नाम इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन है और यह तीन कण प्राकृतिक मूलावस्था के आधारभूत भवन खंड माने जाते हैं. परन्तु यह जान कर आश्चर्य होगा की इन कणों की हिस्सेदारी ब्रह्माण्ड में केवल ५% ही है. सारी पृथ्वी इन्हीं तीन कणों द्वारा निर्मित है परन्तु ब्रह्माण्ड का सबसे अधिक भाग इन कणों द्वारा संरचित नहीं है.
डार्क मैटर ब्रह्माण्ड के २७ प्रतिशत भार का वहन करता है. लेकिन वह प्रकाश का परावर्तन, अवशोषण अथवा विकिरण नहीं करता। इसलिए हम सीधे तौर पर इसका अवलोकन नहीं कर सकते. इसी प्रकार डार्क एनर्जी करीब ६८ प्रतिशत के अनुपात में ब्रह्माण्ड का हिस्सा है. लेकिन उसको महसूस कर पाना वैज्ञानिकों के लिए और भी कठिन है. फिर भी वैज्ञानिकों ने इन के होने का पूर्वकथन किन्ही कारणों से किया है. भौतिक विज्ञानं के किन सिद्धांतो और प्रायोगिक अवलोकनों के आधार पर यह मुमकिन हो पाया है, इस लेख में हम इन तथ्यों को जानेंगे.
डार्क मैटर के प्रमाण
अगर हम इस खगोलीय पहेली के इतिहास में झांके तब हमें १८८४ के लार्ड केल्विन के उस लेख की चर्चा करनी होगी जिसमें उन्होंने प्रथम बार डार्क मैटर का उल्लेख किया था. उन्होंने यह पाया की अगर सूर्य के चारों तरफ ३२६० प्रकाश वर्ष की परिधि में मौजूद तारो की अलग अलग गतियों का विश्लेषण किया जाये तो वह इस तथ्य की तरफ इंगित करेगा की इस परिधि में लगभग एक अरब तारे होने चाहिए। ब्रह्मांडीय वस्तुओ की गतियों में फैलाव या विस्तार अगर ज्यादा है, तब यह इस तथ्य की तरफ इशारा करता है की उस क्षेत्र में पदार्थ का घनत्व भी अधिक होगा. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि ज्यादा घनत्व अधिक गुरुत्वाकर्षण का कारण बन जाने से उस क्षेत्र में तापमान या ऊर्जा की बढ़ोतरी की वजह बन जाता है. इस कारण गतियां बढ़ जाने से उन में विस्तार के ज्यादा होने की संभावना भी बढ़ जाती है. ज्यादा घनत्व ब्रह्मांडीय पदार्थ में ज्यादा अस्थिरता भी पैदा करेगा जिस कारण उस मौजूद पदार्थ में गतियों के विस्तार का अधिकाय भी होगा. लार्ड केल्विन के विश्लेषण के अनुसार सूरज के आस पास मौजूद तारों की गतियों के विस्तार इस बात की और इशारा करेंगे की सूर्य के ३२६0 प्रकाश वर्ष के व्यास के अंदर सौ करोड़ तारे होने चाहिए. लेकिन इन में से अधिकांश तारे किसी भी टेलिस्कोप से देखे नहीं जा सकते. उन्होंने यह निष्कर्ष निकला की इन तारो में अधिकांशतः अँधेरी काया वहन करते हैं.
१९३० के दशक के शुरुआती सालों में जे. एच. ऊर्ट ने यह पाया की हमारी आकाश गंगा के तारों की गति उसमें पहले से ज्यादा द्रव्यमान होने का संकेत देती है. अपने प्रयोगों के दौरान उसने यह पाया की तारों की गति इतनी है की वे पूर्व प्रस्तावित द्रव्यमान वाली आकाश गंगा के क्षेत्र से बाहर जा सकते हैं. उसके अनुसार ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि हमारी आकाशगंगा का द्रव्यमान उस समय की जानकारी के अनुसार गणना किये हुए द्रव्यमान से काफी अधिक है. उसने इस खोज को आश्चर्यजनक माना और उसके मन में शायद इस गणना के प्रति संदेह भी रहा. लगभग उसी समय जब ऊर्ट ने अपनी खोज की, स्विस खगोलशास्त्री एफ. ज़्विकी को भी द्रव्यमान की कमी के समान संकेत मिले, लेकिन बहुत बड़े पैमाने पर. ज़्विकी ने पृथ्वी से लगभग ९९ एम.पी.सी (३२२ मिलियन प्रकाश वर्ष) दूर कोमा क्लस्टर का अध्ययन किया. गैलेक्टिक स्पेक्ट्रा में देखे गए डॉपलर शिफ्ट का उपयोग करके, कोमा क्लस्टर में आकाशगंगाओं के वेग फैलाव की गणना करने पर उसने यह पाया नेब्युलाओं के गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा(-जिसका हिसाब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत द्वारा लगाया जा सकता है) के बीच के सम्बन्ध यह बताते है कि हर व्यक्तिगत आकाशगंगा का द्रव्यमान उसी आकाशगंगा की चमक द्वारा गणित द्रव्यमान से १००० गुना ज़्यादा है. यानी पर्यवेक्षित आकाशगंगा का सिर्फ २% द्रव्यमान ही दृश्यमान है और उसका अधिकांश द्रव्यमान गायब है या गोचर नहीं है.
लगभग ४० साल बाद वेरा रुबिन और सहयोगियों ने एक और महत्वपूर्ण खोज को अंजाम दिया. इन लोगों ने करीब ६० गैलेक्सियों के घूरण का व्यापक अध्ययन किया. इन्होने पर्यवेक्षण के लिए इन गैलेक्सियों में तारों के बीच मौजूद हाइड्रोजन और हीलियम के बादलों को चुना. इस गुट के सदस्यों का मानना था की ये गैस के बादल लगभग उसी तरह व्यवहार करेंगे जिस तरह सौरमंडल में घुमते हुए ग्रह. सौरमण्डलीय ग्रह सूर्य से दूरी के अनुसार अपनी गति बदलते है. जैसे जैसे ग्रह सूर्य से दूर होते जाते है उनकी गति धीमी पड़ने लगती है, क्योंकि सौरमंडल का लगभग सारा द्रव्यमान सूर्य में ही केंद्रित है. यह व्यवहार केपलर के नियमों के अनुसार होता है और इसे केपलरिय व्यवहार के नाम से जाना जाता है. परन्तु उन्होंने पाया की इन गैसीय बादलों की गति गैलेक्सी के मध्य से बाहरी परिधि तक पहले तो बढ़ती है और एक सीमा के बाद स्थिर हो जाती है. इसका लेखाचित्र प्रतिरूपण नीच दिए गए चित्र में दिखाया गया है.

चित्र १. केपलरिय व्यवहार बनाम मापी गयी गति.
इसलिए, यदि घूर्णन वेग, त्रिज्या में वृद्धि के साथ स्थिर रहता है, तो त्रिज्या की बढ़त के साथ द्रव्यमान में वृद्धि होनी चाहिए. चूंकि चमकदार द्रव्यमान का घनत्व आकाशगंगा के केंद्रीय क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए एकदम घटता जाता है , इसलिए “लापता” द्रव्यमान गैर-चमकदार होना चाहिए. रुबिन ने संक्षेप में कहा, “निष्कर्ष अपरिहार्य है: द्रव्यमान, चमक के विपरीत, सर्पिल आकाशगंगाओं के केंद्र के पास केंद्रित नहीं है. इस प्रकार एक आकाशगंगा में प्रकाश वितरण द्रव्यमान वितरण के लिए बिल्कुल भी मार्गदर्शक नहीं है.”
एक और आधुनिक तकनीक पर आधारित प्रमाण तब मिला जब गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग का प्रयोग डार्क मैटर की खोज के लिए किया गया. आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार वज़नदार खगोलीय वस्तुएं अपने चारों तरफ के अंतरिक्ष को मोड़ती है. जैसे प्रकाशीय लेंस प्रकाश किरणों को मोड़ने में सक्षम है उसी प्रकार एक वज़नदार खगोलीय वास्तु अपने पीछे स्थित पिंड से आते हुए प्रकाश की दिशा बदलने में समर्थ है. यह इसलिए होता है, क्योंकि सामान्य सापेक्षतावाद के सिद्धांत के कारण अंतरिक्ष और समय दोनों किसी वस्त्र की तरह सिकुड़ते,फैलते और मुड़ते है जब उसपर कोई वज़न रख दिया जाता है. जब एक खगोलीय पिंड के सीध में एक और खगोलीय पिंड स्थित होता है, तब पीछे वाले पिंड की छवि पृथ्वी पर स्थित वेधशाला में एक प्रभा मंडल की तरह बनती है जिसके मध्य में आगे वाले पिंड की छवि बनी होती है. यह प्रभा मंडल गुरुत्वाकर्षण लेंस द्वारा प्रकाश को मोड़ कर बनाई गयी पीछे वाले पिंड की एक छवि है, जैसे एक साधारण लेंस किसी वस्तु की एक फैली हुई छवि बनाता है. बाहर वाले प्रभा मंडल की त्रिज्या बीच वाले पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर करती है. खगोलशास्त्रियों ने इन गुरुत्वाकर्षण लेंस द्वारा निर्मित छवियों का अध्ययन किया तो पाया कि लेंस बनाने वाले अग्रिम पिंड के द्रव्यमान की जब प्रभा मंडल की त्रिज्या से गणना की गयी तब वह उसी की चमक से गणना किये गए द्रव्यमान से कही अधिक थी. यह इस बात का द्योतक था कि केंद्रीय समूह में डार्क मैटर की अत्यधिकता है.
डार्क मैटर के उम्मीदवार
सिद्धांत कारों ने डार्क मैटर के ढेर सारे उम्मीदवार खोज लिए है. लेकिन यह खोजें, सिद्धांतों तक ही सीमित है. २० साल पहले तक डार्क मैटर की उम्मीदवारी हलकी चमक वाले तारो, या तारों के बीच में पाईं जाने वाली वस्तुएं , या फिर अंतरिक्ष के श्वेत बौने तारे और न्यूट्रॉन तारे और कृष्ण विवर करते थे. यह सब एक साथ एक सामान्य श्रेणी में मिल कर “विशाल कॉम्पैक्ट हेलो वस्तुओं” (एम् . ऐ. सी. एच. ओ.) के नाम से जाने जाते हैं. परन्तु सैद्धांतिक और प्रायोगिक कारणों से इस तरह के कम द्रव्यमान वाले खगोलीय पिंड ख़ारिज कर दिए गए. हबल स्पेस टेलिस्कोप का डाटा हमें यह बताता है कि इस तरह के तारे पूरे ब्रह्मांड का केवल ३% हिस्सा ही हो सकते है. इसी प्रकार भूरे बौने तारे या तारकीय अवशेषों को भी डार्क मटर का उम्मीदवार मानने कि कोशिश हुई परन्तु पुनः किन्ही कारणों से इन पर भी खगोलशास्त्रियों का विश्वास नहीं बन पाया. श्वेत बौने तारे अपने गठन से पहले बहुत ज़्यादा अवरक्त किरणों का उत्पादन करेंगे और उच्च ऊर्जा वाली गामा किरणों को सोखेंगे. ब्रह्मांड के द्रव्यमान वहन करने वाले अलग अलग कणों में से अगर हम सिर्फ श्वेत बौने तारो के गठन में प्रयुक्त होने वाले कणों कि ब्रह्मांड कि हिस्सेदारी की गणना करेंगे तो हम यह भी पाएंगे कि आकाशगंगा का कुल १५% हिस्सा ही श्वेत बौनों द्वारा निर्मित हो सकता है. इसके साथ ही श्वेत बौने अत्यधिक नाइट्रोजन और कार्बन का उत्पादन करेंगे जिसकी मौजूदगी हमें ब्रह्माण्ड में नहीं दिखती.
बेरयोनिक पदार्थ जो कि क्वार्क नामक मूल कणों द्वारा रचित है और जो कि साधारण द्रव्य जैसे तत्वों की रचना करते हैं, इनके अलावा डार्क मटर के अन्य उम्मीदवार भी प्रस्तावित किये गए है. इनमे कमज़ोर रूप से परस्पर क्रिया करने वाले द्रव्यमान वाले कण (डब्लू . आई. एम् . पी) और एक्सिऑन कण प्रमुख है. डब्ल्यू. आई. एम् . पी नामक कण क्योंकि कमज़ोर रूप से क्रियाशील है और इनका द्रव्यमान भी लघु नहीं है, इसलिए यह कण डार्क मैटर के एक सशक्त उम्मीदवार माने जाते हैं. अगर बिग बैंग ब्रह्माण्ड विज्ञानं के अंतर्गत कमज़ोर रूप से क्रियाशील कणों की ब्रह्माण्ड में प्रचुरता की गणना की जाती है तब वह डार्क मैटर की पूर्ति करते हुए दिखाई देते है. इतनी ही प्रचुरता हमें कमज़ोर रूप से क्रियाशील कणों की एलेक्ट्रो-वीक थ्योरी द्वारा गणन किये हुए क्रॉस-सेक्शन द्वारा प्राप्त होती है. इसको डब्ल्यू. आई. एम् . पी चमत्कार के रूप में जाना जाता है. इसी प्रकार सुपरसिमेट्री नामक समरूपता हमें ऐसे कणों के बारे में बताती है जो कमज़ोर रूप से परस्पर क्रियाशील है और साधारण कणों के सुपर समरूपी जोड़ीदार है. अगर इनकी ब्रह्माण्ड में भागीदारी सुनिश्चित हो जाती है तब यह कण एक मज़बूत रूप से डार्क मैटर के प्रत्याशी होने चाहिए. सुपर सिमेट्री में साधारण कणों के जोड़ीदार कण अगर आर- समता का पालन करते है जिसके अनुसार एक प्रकार के कण (बेरियोंन या लेपटोन ) अपनी कुल संख्या संरक्षित रखते है तब समय के साथ क्षय होने पर भी किसी श्रेणी के सबसे हलके सुपर सिमिट्रिक कण अपनी संख्या बरकरार रखेंगे. इस प्रकार न्यूट्रैलिनो जो की सबसे हलके सुपर सिमिट्रिक कण के प्रबल दावेदार है उनकी संख्या इतनी होगी की वह एक डब्ल्यू . आई. एम् . पी प्रकार के डार्क मैटर उम्मीदवार हो सकते है.
एक्सिऑन कण की परिकल्पना न्यूट्रॉन कण के विद्युत द्विध्रुवीय आघूर्ण की उत्पत्ति पर आधारित है. कण भौतिकी के स्टैण्डर्ड मॉडल के अनुसार न्यूट्रॉन को विद्युत द्विध्रुवीय आघूर्ण प्रदान करने वाली गणितीय घटक, प्रभार- समता समरूपता का उल्लंघन करने में सक्षम है. प्रभार-समता समरूपता का अर्थ है की किसी कण के विद्युत् प्रभार का उलट और उसका बिम्ब प्रतिरूपण एक साथ किया जाये तब यह नयी स्थिति पहले वाली स्थिति के साथ परस्पर सममित रहती है. क्योंकि न्यूट्रॉन के विद्युत द्विध्रुवीय आघूर्ण के होने के कारण इस समरूपता का उल्लंघन होता है इसलिए किसी भौतिक तंत्र द्वारा एक प्रकार के कण उपजते है. यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसे की हिग्ग्स बोसॉन की उत्पत्ति होती है जिन्हें ‘गॉड पार्टिकल’ के नाम से पिछले दशक में असीम प्रसिद्धि मिली है. हिग्ग्स बोसॉन की उत्पत्ति का तंत्र अन्य कणों पर भी अलग अलग तरह से लागू हो सकता है और एक्सिऑन कण भी इसी एक श्रेणी में आते हैं. इन कणों के द्रव्यमान की गणना यह बताती है की यह कण भी डार्क मैटर के एक सशक्त उम्मीदवार के रूप में नज़र आते है. विश्व में अनेक स्थानों पर और अलग-अलग तरीको से इन एक्सिऑन कणों के पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है.
डार्क मैटर की खोज
डार्क मैटर का पता लगाना (या बनाना) इसके गुणों और ब्रह्मांड में संरचना के निर्माण में डार्क मैटर की भूमिका निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है. कई प्रयोगों ने डब्लू. आई. एम्. पी जैसे डार्क मैटर (विशेष रूप से न्यूट्रलिनो के लिए) के संकेत की खोज की है और वर्तमान में खोज कर रहे हैं और प्रत्येक एक अलग पहचान विधि का उपयोग करता है.
कण त्वरक में नए कणो की सृष्टि होती है जिस में से कई तरह के डब्लू . आई . एम्. पी श्रेणी के कण हो सकते है. यह कण द्रुत गति से सबसे हलके सुपर सीमेट्रिक कण में क्षय करने के बाद त्वरक से निकास करेंगे. यह इसलिए होगा क्योंकि यह कण कमज़ोर रूप से परस्पर क्रिया करते है और त्वरक की दीवारों से बिना किसी क्रिया किए निकल जाएंगे. यह कण अपने साथ ऊर्जा भी ले कर जाएंगे और इनका अस्तित्व हम कुल ऊर्जा के घटने से पता लगा सकते है. इसी प्रकार क्योंकि इनकी परस्पर क्रिया एकदम शुन्य नहीं है, यह कण कभी परिवेशी पदार्थ के साथ क्रिया भी कर सकते है. किन्ही प्रयोगो में एक आध बार इनकी पारस्परिक क्रिया का पर्यवेक्षण भी किया जा सकता है. कुछ डार्क मैटर कण अपनी ऊर्जा आस-पास के पदार्थ को प्रदान कर सकते है जिस कारण उन पदार्थो के नाभिक या इलेक्ट्रान उच्च ऊर्जा अवस्था में विस्थापित हो सकते हैं. यह अतरिक्त ऊर्जा या तो ध्वनि या तापमान में परिवर्तित हो जाएगी या पदार्थ को प्रभारित कर बैठेगी या फिर वे अतरिक्त ऊर्जा प्रकाश में तब्दील हो जाएगी. इन सब को प्रायोगिक रास्ते से अति शुद्धता के साथ मापा जा सकता है.
अप्रत्यक्ष रूप में डार्क मैटर को ब्रह्माण्ड सम्बन्धी विधियों से जांचा परखा जा सकता है. कण भौतिकी में कणों की सृष्टि और विनाश दोनों ही मुमकिन है. ब्रह्माण्ड में डब्लू.आई .एम् .पी कणो के विनाश के चिन्ह देखने को मिल सकते है. डार्क मैटर कण विनाश के दौरान अत्यधिक ऊर्जा वाली गामा किरणें, या न्युट्रीनो या फिर प्रति कणों का निर्माण कर सकता है जिसकी ब्रह्माण्ड में एक अनूठी छाप देखने को मिल सकती है. वैज्ञानिक इन सब विधियों का इस्तेमाल कर के डार्क मैटर की खोज करने में जुटे हुए है.
डार्क मैटर का भारतीय दर्शन के साथ सम्बन्ध.
भारतीय दर्शन में “नेति नेति” एक प्रकार का विश्लेषणात्मक ध्यान का स्वरुप है. यह ध्यान योग पद्धत्ति उपनिषदों और अवधूत गीता जैसे ग्रंथो में वर्णित है. इस ध्यान पद्धत्ति में ब्रह्माण्ड के स्वरुप के अर्थ को जानने के लिए जो कुछ भी ब्रह्माण्ड की वास्तविकता नहीं है, उसे नकारा जाता है. इसे ज्ञान योग का एक प्रमुख भाग माना जाता है.
एस. एस. राघवाचार द्वारा लिखित पुस्तक “श्री रामानुजाचार्य के वेदार्थ संग्रह का परिचय” में एक और व्याख्या विशिष्टाद्वैत दृष्टिकोण पर आधारित है:
“यह कि गणना किए गए रूप ब्रह्म के रूपों को समाप्त कर देते हैं, यही बात ‘नेति नेति’ में नकार दी गई है। ब्रह्म के रूपों को नकारने से कहीं दूर यह कथन ब्रह्म के रूपों की अनंतता पर जोर देता है। ‘नेति नेति’ अक्षर में नकारात्मक है, लेकिन आत्मा में पुष्टि की एक अति-प्रचुरता को दर्शाता है।”
जैसा की ऊपर दी गयी व्याख्या से स्पष्ट है की “नेति नेति” ब्रह्म के प्रत्यक्ष सबूतों से उपजे ज्ञान को सीमित मानता है और ब्रह्म की अनंतता को दर्शाता है. इसी के साथ “नेति नेति” ज्ञान योग चेतना में केवल प्रकट को सत्य मानने से नकारता है. ऐसा प्रतीत होता है की योग दर्शन द्वारा आत्मन और चेतना पर नियंत्रण कर के जो कुछ भी ब्रह्माण्ड में अप्रत्यक्ष है उसे अनुभव कर के स्वयं तक पहुंचा जा सकता है. यह कुछ वैसा ही है जैसे प्रत्यक्ष पदार्थ को नियंत्रित कर के उस पर डार्क मैटर यानि की अप्रत्यक्ष का प्रभाव देखा जा सकता है,जैसा की भौतिकी के प्रयोगों में कोशिश की जाती है.
अद्वैत के दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने यह भी कहा है कि “नेति नेति” का मुख्य कार्य है अज्ञान (अप्रत्यक्ष) से पैदा हुई बाधा को दूर करना. बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार ब्रह्म के दो रूप हैं, भौतिक और अभौतिक, ठोस और तरल, सत ‘अस्तित्व’ और त्या, ‘वह’ , सत्य – जिसका अर्थ है सच, ब्रह्म के अलावा हर चीज के अस्तित्व को नकारता है। और इसलिए, जीव जैसी कोई अलग इकाई मौजूद नहीं है जिसे शंकराचार्य ने अविद्या (अज्ञान) में ब्रह्म का प्रतिबिंब बताया है।
उपरोक्त के अनुसार जीव यानि मैटर कि कोई अलग इकाई नहीं है और वह अप्रत्यक्ष यानि कि डार्क मैटर में प्रतिबिंबित है या समाया हुआ है. उपरोक्त टिप्पणियों से यह भी साबित होता है कि ध्यान योग साधना से हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष के बीच पारस्परिक क्रियाएं और अंतर भी समझ सकते है. “नेति नेति” एक अर्थ में अकथनीय होने के बावजूद वास्तविकता का सार है. वास्तविकता के हर रूप को नकारने के बावजूद वास्तविकता को नहीं नकारा जा सकता.
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