अनिरुद्ध सिंह.

छपाई का आविष्कार संसार के उन महत्वपूर्ण आविष्कारों की श्रेणी में आता है जिसने दुनिया की तस्वीर ही बदल कर रख दी. इसकी मदद से पुस्तकें , अखबार , पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगी और दुनिया में व्यापक स्तर पर आम -जन में साक्षरता का प्रवाह हुआ.

छपाई का इतिहास करीब ५००० साल पुराण है. सबसे पहले प्राचीन मेसोपोटामिया में ३००० वर्ष ईसा पूर्व इसका इस्तेमाल होने लगा जब गोल मोहर को मिट्टी की पट्टी पर दबा कर एक से ज़्यादा प्रतिबिम्ब उकेर कर कई प्रति लिपियाँ बनाई जाने लगी. यही तकनीक चीन , मिस्र , भारत  और यूरोप में भी काम में लायी जाने लगी. धीरे-धीरे तकनीक में विकास के साथ कपड़ों और कागज़ के ऊपर छपाई भी होने लगी.

छपाई की व्यापक स्तर पर शुरुआत  ठप्पा छपाई के रूप में प्राचीन भारत और चीन में हुई. चीन में प्रथम उदाहरण करीब २०० साल ईस्वी में कपड़े के ऊपर सामने आया. इस तरह की तकनीक में लिखाई या कोई चित्र एक लकड़ी के खंड पर अंकित किया जाता है. कपड़े पर जो जगह खाली रखनी होती है वह एक चाक़ू या धारदार औज़ार से लकड़ी पर काटी जाती है. जो सतह उभर कर आती है  उसे काली स्याही के सहारे एक ठप्पे में परिवर्तित कर दिया जाता है जो कपड़े पर अपनी छाप छोड़ जाता है. चीन में यह तकनीक आगे जा कर कागज़ पर भी इस्तेमाल की जाने लगी. इस तरह से कई बौद्ध धार्मिक ग्रन्थ विश्व में प्रचलित होने लगे.

भारत में बौद्ध धर्म के आगमन के साथ शास्त्रों की छपाई पर ज़ोर दिया जाने लगा. धार्मिक प्रार्थनाएं मिट्टी की पट्टिकाओं  पर गोद के संभाल कर रखी जाने लगी थी. बौद्ध गाथाएं जैसे की नागार्जुन की प्रतीयसमुत्पद गाथा छटवी शताब्दी के दौरान मिट्टी की पट्टिका पर बहुत बड़ी तादाद में छापी गयी.

ब्लॉक मुद्रण सबसे पहले चीन में रेशम के ऊपर प्रयोग में लाया गया. इस मुद्रण तकनीक द्वारा रेशम पर फूल और पत्तियां मुद्रित की जाती थी. सातवीं शताब्दी ईस्वीं के आस पास ब्लॉक मुद्रण का प्रयोग कागज़ पर भी होने लगा था. नवी शताब्दी तक एक मुकम्मल पुस्तक के मुद्रित होने के प्रमाण मिलते है. दसवीं  शताब्दी तक  सूत्रों और तस्वीरों  की लगभग ४००,०००  प्रतियां मुद्रित हो चुकी थी. धीरे-धीरे छपाई की तकनीक पूर्वी एशिया में जैसे की कोरिआ और जापान में फैलने लगी थी. इसके अलावा  फारस और रूस  तक भी इस तकनीक का फैलाव होने लगा था. यूरोप में छपाई का प्रयोग बहुत बाद में हुआ , जब इस्लामी सभ्यता ने इसका बढ़ाव पश्चिमी दुनिया में किया.

तांग वंश चीन के समय का संस्कृत और चीनी भाषा में धरानी छापा, ६५०-६७० ईस्वी

तांग वंश चीन के काल का हीरक सूत्र का मुख्य खंड , ८६८ ईस्वी.

इस्लामी सभ्यता में ब्लॉक मुद्रण का प्रयोग इस्लामी सभ्यता के स्वर्णिम युग में दसवीं शताब्दी के आसपास  होने लगा था. अरबी में इस प्रकार के मुद्रण  को टर्श के नाम से जाना जाता है. यहाँ पर लकड़ी के अलावा टीन और अन्य धातुओं के ब्लॉक का भी उपयोग होने लगा था. ये लोग इस तकनीक का उपयोग प्राथनाओं की छपाई के लिए करते थे. बाद में इसका प्रयोग कपड़े के अलावा कागज़ पर भी होने लगा जब इन लोगो ने अपने धार्मिक ग्रंथों के अंशों की छपाई भी आरम्भ की.

ठप्पा छपाई यूरोप में १३०० ईस्वीं के आसपास प्रयोग में लायी गयी. यह विधि सर्वप्रथम कपड़ों पर छपाई के काम में लायी गयी. कागज़ के प्रचार-प्रसार के बाद धीरे-धीरे ताश के पत्तों पर छपाई होने लगी. १४०० ईस्वीं के आसपास  इस तरह की छपाई भरी तादाद में होने लगी थी. मध्य १५वी शताब्दी में एक समूचे खंड पर मुद्रित पुस्तक, जिसमे शब्द और चित्र दोनों ही मौजूद थे, प्रकट होने लगी. इस तरह की पुस्तकों ने अपने ज़माने में काफी प्रसिद्धि हासिल की और ये पुस्तके वियोज्य टाइप द्वारा मुद्रित पुस्तकों को टक्कर देती थी.

१०वी शताब्दी में चीन में छपाई की एक और तकनीक का आरम्भ हुआ. इसे वियोज्य टाइप तकनीक के नाम से जाना जाता है. इस तकनीक में यह ख़ास बात थी की छपाई के लिए धातु के चलायमान टुकड़ों का उपयोग किया जाता था. वियोज्य टाइप से छपाई अपने आधुनिक रूप में उभर पायी और छपाई की प्रक्रिया और ज़्यादा आसान और फलोत्पादक हो पायी. १०४० में चीनी मिट्टी पर उभारे गए टाइप के टुकड़े उत्पन्न किये गए और उन्हें छपाई के कार्य में लगाया गया.

१०४० ईस्वी में बाई-शेंग ने वियोज्य छपाई का चीन में आविष्कार किया. उन्होंने मिट्टी के छपाई टुकड़ों की मदद से इस को फलस्वरूप किया. १२९८ में वांग झेन  ने लकड़ी के छपाई टुकड़ों का उपयोग शुरू किया. उन्होंने टाइप को घूमने वाली तालिकाओं में बैठाने की तकनीक में भी महारत हासिल की. इस तकनीक के उपयोग से टाइप बैठाना और छपाई करना और भी आसान हो गया. १२वी सदी में चीन में कागज़ के नोटों की छपाई का सिलसिला भी चालू हो गया था. धीरे धीरे यह छपाई कला चीन के आसपास दूसरे देशों में भी फैलने लगी. कोरिया में १२३० में पीतल के द्वारा वियोज्य छपाई होने लगी थी.

१४५० में जोहानेस गुटेनबर्ग ने प्रथम वियोज्य छपाई का छापाखाना यूरोप में आरम्भ किया. इन्होने इसमें कई तरह के सुधार किये -जैसे कि हस्त मोल्ड का उपयोग, तेल पर आधारित स्याही का उपयोग,  मुद्रकों के उपयोगी  छापने कि पेंचदार मशीन और नरम और सोखदार कागज़ का उपयोग. गुटेनबर्ग वह पहला व्यक्ति था जिसने अपनी छपाई के लिए मिश्र धातु का उपयोग किया. उनके फॉर्मूले का इस्तेमाल आज भी छपाई के लिए किया जाता है. १४३६ में गुटेनबर्ग ने यूरोप के प्रथम छापेखाने की स्थापना की.

वियोज्य छपाई के कारण छपाई प्रक्रिया और ज्यादा तेज़ और कुशलतापूर्वक पूरी होने लगी. धातु के ब्लॉक के इस्तेमाल से छपाई की गुणवत्ता में भी फर्क आया और अलग-अलग फॉन्ट का भी उपयोग होने लगा. छपाई के ऊपर व्यय में भी भरी कमी आयी. यह इसलिए हुआ क्योंकि धातु के ठप्पे ज़्यादा टिकाऊ होते थे. १४५५ में गुटेनबर्ग बाइबिल का प्रकाशन हुआ जिसकी छपाई उत्तमता पहले की तुलना में कही ज़्यादा थी और उसकी कीमत पहले से कही कम थी.  यूरोपीय  पुनःजागरण के काल में इस नयी छपाई तकनीक ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यूरोप में इसके फैलाव में इसका एक अहम् योगदान रहा. इसके बाद रोटरी प्रिंटिंग प्रेस का भी आगमन हुआ. १८४३ में रिचर्ड मार्च ने इसका उपयोग सबसे पहले शुरू किया. इसके इस्तेमाल से कागज़ के निरंतर रोल पर छपाई मुमकिन हो सकी.

छपाई का प्रभाव एक से अधिक जगहों पर पड़ा. इसने सामजिक स्तर पर, धार्मिक और राजनैतिक स्तर पर और शिक्षा के क्षेत्र में एक गहरा असर छोड़ा. यह कहना गलत नहीं होगा कि इसका असर व्यापार पर भी उतना ही पड़ा जितना अन्य स्थानों पर. बड़ी-बड़ी यूनिवर्सटियों और पुस्तकालयों का निर्माण भी संभव हो सका. लेटरप्रेस और ऑफसेट छपाई के आने के बाद पुस्तकों कि छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी और सिर्फ चार सदियों के बाद पुस्तकों का व्यापार १० लाख  से १० करोड़ प्रतियों में बदल गया.

शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी  परिवर्तन होने लगा और कुछ ही समय में एक बड़ा शिक्षित वर्ग खड़ा हो गया. जनमानस में आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा मिला और लोगो के नज़रिये में एक बड़े स्तर पर बदलाव होने लगा. राजाओं और सुल्तानों को यह समझ में आने लगा कि अगर राज करना है तो मुद्रित सामग्री पर नियंत्रण बेहद ज़रूरी है. धर्म के फैलाव में और धर्म का आधुनिक युग में एक मुख्य शक्ति के रूप में उभरने में भी मुद्रण तकनीक का एक बहुत बड़ा हाथ है. आज के युग में अखबार और मुद्रित मिडिया का बोलबाला है और उसे समाज में चौथी शक्ति का दर्जा प्राप्त है. प्रिंट मीडिया एक ऐसा शक्तिशाली हथियार है जिसके द्वारा सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर दूरगामी बदलाव संभव है और उसका समाज पर अप्रत्यक्ष परन्तु गहरा प्रभाव है.

चित्र साभार : विकिपीडिया


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