लूप क्वांटम ग्रैविटी क्या है?
अनिरुद्ध सिंह.
इंसान ने जब से सोचने की शुरुआत की तब से ही उसके मन में यह सवाल आता रहा कि प्रकृति कि विभिन्न भौतिक घटनाओं के बीच में क्या आंतरिक सम्बन्ध है? विज्ञान के इतिहास में ऐसे अनेक पड़ाव है जब मानव अलग -अलग प्राकृतिक घटनाओं के बीच में गहरे रिश्तों कि पड़ताल कर के प्रगति पथ पर अग्रसर हुआ. प्राचीन मानव ने जब मुख्तलिफ मौसमों के बीच में एक अनुक्रमिक सम्बन्ध पाया तब उसे वार्षिक कैलेंडर का ज्ञान हुआ. इसी के साथ जब मौसम का सूर्य और तारों के साथ तालमेल देखा गया तब खगोल विज्ञान और उसके कृत्रिम उपोत्पाद ज्योतिष का प्रकटीकरण हुआ.
आधुनिक युग में भी भिन्न घटनाओं के बीच सम्बन्ध खोजने के प्रयास मनुष्य को भौतिक दुनिया को समझने में दूर तक सहायक साबित हुआ. न्यूटन ने फलों के धरती पर गिरने और चन्द्रमा का कक्ष में घूमने के बीच गहरा सम्बन्ध देखा और गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया. फैराडे और एम्पेयर जैसे वैज्ञानिको ने विधुत प्रवाह और चुम्बकीये क्षेत्र में सम्बन्ध देखा और मैक्सवेल द्वारा विधुत और चुम्बकीये क्षेत्र का गणितीय एकीकरण सम्पूर्ण हुआ. आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण और स्पेस टाइम के बीच के कनेक्शन की पड़ताल की.
आधुनिक भौतिकी में आइंस्टीन का रिलेटिविटी सिद्धांत और हिजेनबर्ग – श्रोडिंगर- डिराक का क्वांटम सिद्धांत दो आधार भूत स्तम्भ है. रिलेटिविटी खगोलीय वस्तुओं पर लागू होती जो की मिलियन और बिलियन किलोमीटर के दूरी पर स्थित बहुत ही भारी पिंडो की गतिविधियों का परिक्षण करती है. क्वांटम भौतिकी बहुत ही सूक्ष्म वस्तुओं का ऐटोमीय और नाभिकीय दूरी पर आपस में व्यवहार परखने की कोशिश करती है. लेकिन यह दोनों सिद्धांत एक दूसरे के साथ सुसंगत नहीं है और न ही एक दूसरे के पूरक है.
नीचे दिए गए चित्र में आइंस्टीन की जनरल रिलेटिविटी थ्योरी और क़्वांटम फील्ड थ्योरी की उपयुक्तता के क्षेत्र वर्णित किये गए है. x -अक्ष पर दो परस्पर प्रभावी इकाईओं के बीच न्यूनतम दूरी अंकित है जिसे b यानि की इम्पैक्ट पैरामीटर के नाम से जाना जाता है और y – अक्ष पर पिंडो की ऊर्जा अंकित है. जैसा की नीचे दिया गया चित्र बताता है कि एक ऐसा विस्तृत हरा क्षेत्र है जहां पर दोनों थ्योरी कोई निर्णायक समाधान नहीं दे पाती.

जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी के अनुसार स्पेस-टाइम घुमावदार है और हर घटना निश्चयात्मक परिणाम लिए हुए होती है. क़्वांटम थ्योरी के अनुसार हर चीज़ निश्च्यात्मक न हो के सिर्फ संभावनाओं पर आधारित है और आतंरिक चरों में सार्वत्रिक समरूपता लिए हुए होती है. जनरल थ्योरी में आतंरिक चरों में सार्वत्रिक समरूपता का कोई स्थान नहीं है. जनरल थ्योरी में अवलोकन हमें सटीक नतीजे तक पहुँचाता है और इस थ्योरी में अवलोकित भौतिक मात्राओं के अलावा कोई आतंरिक चरों के संभावित प्रभाव कि गुंजाइश नहीं है. क़्वांटम ग्रैविटी कि सोच कि शुरुआत इसी चुनौती की एक बुद्धिवादी स्वीकृति से हुई थी. लूप क्वांटम ग्रेविटी ने इन दोनों भौतिक सिद्धांतों का मिलान करने की दृष्टि से भौतिक जगत में प्रवेश किया. इसमें तार्किक रूप से सापेक्षतावाद और क्वांटम भौतिकी के मूल तत्त्व सम्मिलित है. यह पृष्टभूमि में स्पेस टाइम के होने को सापेक्षतावाद की तरह नकारती है और साथ में स्पेस- टाइम के पृथक हिस्सों रूपी मौलिक क्वांटम इकाईओं के होने की घोषणा भी करती है.
कभी कभी दो सिद्धांतों का एक दुसरे से सुसंगत होना अपने आप में एक कठिनाई न हो कर एक असीम अवसर प्रदान करने का कारण बन सकता है. न्यूटन का उदाहरण हमारे सामने है.उन्होंने गैलेलिओ के अनुवृत्त और केप्लर के दीर्घवृत्त को एकाकार कर के सार्वभौम गुरुत्वाकर्षण का पता लगाया. आइंस्टीन यांत्रिकी और विद्युत् गतिकी के बीच में असहमति का फायदा उठा कर विशेष सापेक्षतावाद तक पहुंचे. इसी प्रकार विशेष सापेक्षतावाद और न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण में विरोधाभास का संलयन कर के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत की स्थापना की. क्वांटम गुरुत्वाकर्षण भी इसी श्रेणी में एक चेष्टा है.
क्वांटम ग्रेविटी के इतिहास में झाकेँ तब हमें काफी पीछे बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में जाना पड़ेगा. उस समय सोवियत रूस में भौतिकी विज्ञान के जादूगर लेव लैंडौ की एक भूल ने क्वांटम ग्रेविटी की समझ पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. १९३१ में लैंडौ और पैअरल्स ने यह प्रस्तावित किया कि हैसेंबेर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत हमें इस तरफ भी ध्यान दिलाता है कि विद्युत् चुम्बकीय क्षेत्रों को भी मनमानी परिशुद्धतता के साथ मापा नहीं जा सकता. बोहर यह देख पाए कि लैंडौ के प्रस्ताव में गलती है. बोहर,रोसेनफेल्ड के साथ मिल कर १९३३ में यह साबित कर पाए कि विद्युत्-चुम्बकीय क्षेत्रों का एकदम सटीक मान मापा जा सकता है. लैंडौ के करीबी दोस्त, मतवै पेत्रोविच ब्रॉन्स्टेइन ने इसी गणना को गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र पर दोहराया. उन्होंने यह पाया कि लैंडौ की सोच गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र पर सटीक बैठती है, अगर हम सामान्य सापेक्षता और क्वांटम भौतिकी दोनों को सत्य माने.

ब्रॉन्स्टेइन का आखिरी फोटो चित्र.
अगस्त 1937 में, मात्वेई ब्रोंस्टीन को स्टालिन के महान शुद्धिकरण अभियान के संदर्भ में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें एक संक्षिप्त मुकदमे में दोषी ठहराया गया और फाँसी दे दी गई. उनका दोष स्टालिनवाद के बिना साम्यवाद में विश्वास करना था.
अब हम ब्रॉन्स्टेइन के मूल तर्क को आसान भाषा में समझते है.
मान लीजिये कि आप किसी कण कि स्थिति L बराबर दूरी कि सूक्ष्मता से मापना चाहते है. क्वांटम भौतिकी हमें यह बताती है कि किसी भी कण की स्थिति और संवेग में स्वाभाविक अनिश्चितता होती है जो की Δx और Δp के बराबर होती है और इन दोनों का गुणनफल, प्लांक स्थिरांक ħ से अधिक होना चाहिए. इस बात से हम ये निष्कर्ष निकाल सकते है कि, प्रथम, Δx को L से कम होना चाहिए और द्वितीय , Δp को ħ/L से बड़ा होना चाहिए. क्योंकि ऊर्जा E, अतितीव्र गतिमान कणों में , जोकि प्रकाश कि गति को छूते है, pc के बराबर होती है, जहां p संवेग और c प्रकाश की गति है , उसका भी ħc/L से बड़ा होना निश्चित है. अब हम गुरुत्वाकर्षण की ओर मुड़ते है. किसी श्याम विवर की श्वार्ज़चाइल्ड त्रिज्या GM / c2 के बराबर होती है, जहाँ G यूनिवर्सल गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक है. अगर किसी कण की स्थिति इतनी संकुचित कर दी जाये की वह L से कम हो जाये तब हैसेंबेर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत है यह बताता है कि उसकी ऊर्जा ħc/L से अधिक हो जाएगी और क्योंकि E = Mc2 के अनुसार ऊर्जा और द्रव्यभार एक ही माने जाते है, किसी श्याम विवर कि श्वार्ज़चाइल्ड त्रिज्या को उसकी ऊर्जा ,जो कि ħ/L के बराबर है, के साथ सामान बनाने से हम यह पाएंगे कि:
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यानी इस दूरी, जोकि 10-33 cm के बराबर है, से कम दूरी पर किसी कण को स्थानबद्ध करना अर्थहीन है, क्योंकि इस दूरी से कम दूरी से कोई जानकारी निकालना असंभव है जोकि एक श्याम विवर के घटना क्षितिज के अंदर है. ब्रोंस्टीन के शब्दों में: “शास्त्रीय अवधारणाओं में गहन संशोधन के बिना ऐसा प्रतीत होता है कि गुरुत्वाकर्षण के क्वांटम सिद्धांत को [अल्प-दूरी] क्षेत्र तक विस्तारित करना लगभग असंभव है.” [ब्रोंस्टीन (1936)]. इसका तात्पर्य यह है कि क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत द्वारा प्रदान की गई पारंपरिक सहज समझ क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के लिए विफल हो जाती है. क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत में क्वांटम क्षेत्रों को स्पेस टाइम पर परिभाषित करने की विश्वदृष्टि आम है, लेकिन क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के लिए इसे छोड़ना आवश्यक है. हमें भौतिकी करने का एक बिल्कुल नया तरीका चाहिए, जहाँ अंतरिक्ष और समय क्वांटम अवस्थाओं से पहले नहीं, बल्कि बाद में आते हैं. अंतरिक्ष और समय क्वांटम विन्यासों के साथ सिर्फ एक अर्धशास्त्रीय समीपता स्थापित करते हैं. क्वांटम अवस्थाएँ स्पेस टाइम पर क्वांटम अवस्थाएँ नहीं हैं. वे स्पेस टाइम की क्वांटम अवस्थाएँ हैं. यही वह है जो लूप क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रदान करता है.
लूप क्वांटम ग्रेविटी में, क्षेत्रफल और आयतन सतत नहीं होते, बल्कि प्लांक पैमाने पर असतत पैकेटों या क्वांटा के रूप में मौजूद होते हैं (क्षेत्रफल के लिए लगभग 10⁻⁷⁰ मीटर² और आयतन के लिए 10⁻¹⁵ मीटर³). ये क्वांटा इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि स्पेसटाइम स्वयं दानेदार होता है, जिसे स्पिन नेटवर्क द्वारा दर्शाया जाता है, जहाँ नोड्स आयतन क्वांटा होते हैं और लिंक क्षेत्रफल क्वांटा होते हैं, जो अंतरिक्ष को एक चिकने सतत क्षेत्र के बजाय परिमित लूपों के बुने हुए ताने-बाने के रूप में प्रकट करते हैं.

क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के उद्भव से जुड़े चार प्रमुख विचारक. बाएं से: लैंडौ, बोहर, रोसेनफेल्ड और ब्रोंस्टीन. यह तस्वीर खार्कोव में ली गई थी और 20 मई, 1934 को अखबार खार्कोवस्की राबोची (द खार्कोव वर्कर) में प्रकाशित हुई थी.
चित्र साभार: Covariant Loop Quantum Gravity: An elementary introduction to Quantum Gravity and Spinfoam Theory. कार्लो रोवेली और फ्रांसेस्का विडोटो.
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