आइंस्टीन-पोडोल्स्की-रोसेन विरोधाभास।

आइंस्टीनपोडोल्स्कीरोसेन विरोधाभास।

अनिरुद्ध सिंह

क्वांटम फिजिक्स का जब मैग्नीफाइंग ग्लॉस से बारीकी से निरिक्षण किया जाता है तब उसकी दार्शनिक संरचना में कुछ विरोधाभास प्रकट होते है। इसमें दो पार्टिकल्स के वेव फंक्शन का उलझाव जो की अति दूर बैठे दो कणों के बीच में संदेशों का स्थानांतरण प्रकाश की गति से भी अधिक, लगभग तुरंत ही संभावित कर सकता है, प्रमुख है।  इसी प्रकार हिजेनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत के अनुसार वास्तविकता प्रयोगकर्ता  पर निर्भर करती है और वास्तविकता का बिना मापक के कोई अर्थ नहीं है , इसका भी आइंस्टीन उम्रभर खंडन करते रहे। आइंस्टीन ने कई ऐसे वैचारिक प्रयोग गढ़े जो की क्वांटम मैकेनिक्स की अपूर्णता को रेखांकित करते है। इस विवाद की शुरुआत 1911 में पहले सोल्वे सम्मेलन (First Solvay Congress) से ही आकार लेने लगा था, जहां विकिरण और क्वांटा (Quanta) पर चर्चा हुई थी और आइंस्टीन सबसे युवा उपस्थित लोगों में से एक थे । लेकिन यह वैचारिक युद्ध 1927 के पांचवें सोल्वे सम्मेलन में पूरी तरह से खुलकर सामने आया । इस सम्मेलन में, नील्स बोहर ने अपनी ‘पूरकता’ (Complementarity) की अभूतपूर्व अवधारणा प्रस्तुत की। इस सिद्धांत के अनुसार, क्वांटम इकाइयां तरंग (Wave) और कण (Particle) दोनों के गुण प्रदर्शित करती हैं, लेकिन उन्हें एक ही समय में एक साथ नहीं मापा जा सकता; हम जो देखते हैं वह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कैसे मापते हैं ।

आइंस्टीन और  बोहर के बीच में गंभीर बहस की शुरुआत 1927 में पांचवी सोल्वोय कांफ्रेंस में शुरू हुई जब आइंस्टीन ने एक वैचारिक प्रयोग के सहारे बाहर के पूरकता अवधारणा को चुनौती दी। उनके अनुसार किसी प्रणाली को लेकर ऊर्जा और संवेग के संरक्षण के भौतिक नियम को समाहित कर के हम किसी कण के संवेग और स्थान की सही जानकारी प्राप्त कर सकते है हालाँकि वह कण एक तरंग-नुमा व्यतिकरण (Interference) का अनुभव कर रहा होता है।  आइंस्टीन के तर्क को समझने के लिए हम नीचे दिए गए दो रेखाछिद्र व्यतिकरण (Double slit  interference ) प्रयोग के चित्र का सहारा ले सकते है।

चित्र 1- दो रेखाछिद्र व्यतिकरण प्रयोग का रेखाचित्र

 उन्होंने एक  सिंगल-इलेक्ट्रॉन के डबल   स्लिट   प्रयोग का  प्रस्ताव  दिया, जिसमें  स्लिट  वाले पर्दे के ‘रिकॉइल’ (Recoil) को मापकर   यह  पता  लगाया   जा सकता था कि  इलेक्ट्रॉन  किस रास्ते से गया । बोहर ने इसी  प्रयोग का  उपयोग  करते हुए यह   सिद्ध कर दिया कि हम  जितना   अधिक ‘किस  रास्ते’ (Which way) की जानकारी  प्राप्त   करते हैं, व्यतिकरण पैटर्न (Interference pattern) उतना ही  अधिक धुंधला हो जाता है, जो बोहर के   स्वयं के  पूरकता   सिद्धांत का   एक  आदर्श  उदाहरण  था । इसी प्रयोग को ज़रा ठीक से समझते है।

जैसा की चित्र में वर्णित है इलेक्ट्रान की एक किरण स्लिट S1  से सामने की तरफ फैलती हुई स्क्रीन S2  की तरफ  बढ़ती है| जब वह स्क्रीन S2  के  समीप पहुँचती तब इलेक्ट्रान  का एक कण या तो b रेखाछिद्र से य c  रेखाछिद्र से निकल कर अंतिम स्क्रीन F तक पहुंचेगा| बोहर  के अनुसार अनिश्चितता के सिद्धांत के कारण  पर्यवेक्षक यह नहीं जान सकता की इलेक्ट्रान  का कण किस छिद्र से गुज़रा| अगर वे कोई उपकरण छिद्र b  और c  में फिट करता हे यह जानने के लिए की प्रकाश का कण किस छिद्र स गुज़रा तब अंतिम स्क्रीन का व्यतिकरण पैटर्न ध्वंस्त हो जायेगा| अथार्त  इलेक्ट्रान का तरंग नुमा व्यवहार एक व्यतिकरण पैटर्न बनाने में सक्षम है अगर हमारा प्रयोग इलेक्ट्रान का तरंग नुमा व्यवहार देखने के लिए उचित है| अगर हम अपने प्रयोग से इलेक्ट्रान का कण रुपी व्यवहार देखने की कोशिश करेंगे ( जैसे की छिद्रो में उपकरण फिट करना) तब हमें उसका कण रुपी व्यवहार देखने को मिलेगा| यह बोहर  का कम्प्लीमेंटरी सिद्धांत है|

आइंस्टीन ने अपना तर्क देते हुए यह कहा की ऊर्जा और संवेग के संरक्षण के सार्वभौमिक सिद्धांतो का सहारा लेते हुए बोहर  के कॉम्प्लिमेंटरी सिद्धांत को बाईपास किया जा सकता है| अब हम आइंस्टीन के तर्क को समझते है| आइंस्टीन के अनुसार जब इलेक्ट्रान पहली स्लिट S1 से गुज़रता है तब वह आगे आने वाली ऊपर वाली स्लिट b अथवा नीचे वाली स्लिट c से गुज़रेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि  पहली स्लिट S1 का रीकोईल  किस दिशा में था| अगर पहली स्लिट S1 का रीकोईल नीचे की ओर था तब यह निश्चित है कि इलेक्ट्रान ऊपर की दिशा की और गया है और वह b स्लिट से गुज़रेगा  और अगर पहली स्लिट S1 का रीकोईल ऊपर की तरफ है तब वह इलेक्ट्रान को नीचे की तरफ निर्देशित करेगी और इलेक्ट्रान नीचे की स्लिट c  से गुज़रेगा| क्योंकि पहली स्लिट का रीकोईल हम इलेक्ट्रान के उसमे से गुजरने के बाद मापते है तो वह मापन  क्रिया इलेक्ट्रान को आगे प्रभावित नहीं करेगी और व्यतिकरण प्रयोग के निष्कर्ष निर्विघ्न रहेंगे और हमें एक व्यतिकरण पैटर्न की प्राप्ति होगी| आइंस्टीन के अनुसार आब्जर्वर ने बिना पैटर्न की प्राप्ति में विघ्न डाले, यह निश्चित कर लिया की इलेक्ट्रान का पथ क्या है और यह क्वांटम भौतिकी के प्रथम सिद्धांतों से असंगत है|

बोहर का काउंटर तर्क समझने की कोशिश में हमे नीचे दिए गए चित्र का सहारा लेना पड़ेगा|

चित्र 2- बोहर का काउंटर तर्क| पहली स्लिट की गति मापन|

बोहर के अनुसार अगर हमे अगर पहली स्लिट की गति इलेक्ट्रान के उसमे से गुजरने के बाद मापनी हो तो हमें उसकी गति उसके गुजरने से पहले अत्यधिक शुद्धता से मालुम हों चाहिए| परन्तु अत्यधिक परिशुध्दता से मापी गयी गति यह ज़रूरी बना देगी कि उसकी स्थिति और स्थान में एक अनिश्तित्ता आ जाएगी, यह हिजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत हमे बताता है| इसलिए यह क्वांटम अनिश्चितत्ता व्यतिकरण पैटर्न को औसतीय रूप में दर्ज कर के उसे ध्वंस्त कर देगी|

इन तरह के डिबेट आइंस्टीन और बोहर के बीच में चलते रहे और तब आइंस्टीन ने अपना दावा अंतिम रूप में 1935 में एक शोध पत्र के रूप में रखा| उन्होंने पोडोल्स्की और रोसेन के साथ अपने शोध पत्र में ई .पी .आर. विरोधाभास की प्रथम परिकल्पना प्रस्तुत की| 1951 में डेविड बोह्म ने ई. पी. आर. विरोधाभास का एक संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत किया| मान लीजिये आप एक प्रयोग में दो प्रकाश के कण फोटोन का सृजन करते है| ये दोनों कण एक क्वांटम उलझाव की स्थिति में है और विपरीत दिशा में संवाहित है| इन फोटोन  युगल का तरंग फलन (wave function) कुछ इस प्रकार है|

इस तरंग फलन में दोनों  फोटोन ध्रुवीकरण की उलझाव वाली स्थिति में है| अब अगर दोनों फोटोन पर विपरीत दिशा में काफी दूरी पर पहुंच कर उनमे से एक के  ध्रुवीकरण का मापन किया जाये तब क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतो के अनुसार नया तरंग फलन कुछ इस प्रकार होगा:

यानी की तरंग फलन में गिरावट (collapse) होगा और पहले और दुसरे फोटोन दोनों एक निश्चित ध्रुवीकरण वाली स्थिति में आ जायेंगे| अब विरोधाभास यहाँ है कि क्योंकि दोनों फोटोन अत्यधिक दूरी पर है , एक फोटोन पर मापन दुसरे फोटोन को कैसे प्रभावित कर सकता है, वह भी तात्कालिक रूप से| ध्रुवीकरण की अनिश्चितता वाली स्थिति में होने के बावजूद दुसरे फोटोन बिना किसी हस्तक्षेप  के निश्चित स्थिति कैसे प्राप्त कर लेता है| आइंस्टीन के अनुसार यह दूर बैठे भूतिया  हरकत है जिसकी भौतिकी में कोई जगह नहीं| धीरे धीरे प्रयोगो द्वारा यह साबित होने लगा कि यह भूतैली कार्यवाही भौतिक जगत का एक कठिन सत्य है| आइंस्टीन ने गुप्त चरों (hidden variables) बात भी उठाई जिन की मौजूदगी क्वांटम भौतिकी को परिपूर्ण बनाने में सक्षम होगी और जिन के द्वारा इस प्रकार के अभौतिक कार्यवाही से पार पाया जा सकता है| अपने अंतिम दिनों तक आइंस्टीन अपने पक्ष पर कायम रहे और यह प्रश्न उठाते रहे कि क्यों क्वांटम भौतिकी ने स्थानीय यथार्तवाद को ताक पर रख दिया|

चित्र साभार : विकिपीडिया